Silent Seva, Infinite Blessings मैंने जीवन भर निःस्वार्थ भाव से सेवा की — परिवार के लिए, समाज के लिए। मेरा हर कर्म शुद्ध और स्वार्थ-मुक्त था। फिर भी, इसे अक्सर नज़रअंदाज़ किया गया, तुच्छ समझा गया, और कभी-कभी अपमान भी सहना पड़ा। फिर भी, मैं नहीं रुका। मेरा भरोसा लोगों पर नहीं, बल्कि उस पर था जो हर भावना को जानता है — ईश्वर पर। उसकी कृपा से सेवा के द्वार धीरे-धीरे खुलते गए। अपमान और तिरस्कार ही मेरी असली परीक्षा बने। आज मेरे भीतर अनुभव, आत्मविश्वास और करुणा का एक असीम भंडार है — ऐसा खजाना जिसे कोई छीन नहीं सकता। अब मेरी ऊर्जा उन्हीं स्थानों पर जाती है, जहां सेवा को प्रेम और श्रद्धा से स्वीकार किया जाता है। निःस्वार्थ सेवा का सार: ईश्वर की दृष्टि में यह सर्वोच्च है। समाज इसे कभी-कभी तुच्छ समझे, लेकिन यह हमारी परीक्षा बनती है। अपमान और तिरस्कार से छिपा है हमारा असली आत्मबल। जब सेवा स्वार्थ-मुक्त होती है, हर कठिनाई सीख बन जाती है। सच्ची सेवा हमें असीम आंतरिक शांति और खुशी देती है। "जिस दिन तुम्हारे भीतर परमार्थ की अग्नि स्वार्थ को जला देगी, उसी दिन ईश्वर की करुणा तुम्हारी ओर श...
Fatherhood of God & Brotherhood of Man.