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बचपन की तलाश: घर से स्कूल तक

बचपन की तलाश: घर से स्कूल तक बचपन की तलाश: घर से स्कूल तक ~ आनंद किशोर मेहता कई बार जब हम बच्चों को ध्यान से देखते हैं, तो उनकी आँखों की चुप्पी एक सवाल पूछती है— “जो स्नेह और समझ एक शिक्षक दे देता है, वही माता-पिता क्यों नहीं दे पाते?” यह सवाल किसी एक घर का नहीं, बल्कि हर उस मन का है जो बच्चों की भावनाओं को महसूस करना चाहता है। घर और स्कूल दोनों बच्चे की दुनिया बनाते हैं, लेकिन बच्चे का अनुभव दोनों जगह अलग होता है। माता-पिता अपनी जिम्मेदारियों, काम और उम्मीदों में इतने उलझ जाते हैं कि वे बच्चों के मन को उतना समय नहीं दे पाते जितना देना चाहिए। दूसरी ओर, एक संवेदनशील शिक्षक बच्चे को सिर्फ विद्यार्थी नहीं मानता—वह उसकी चुप्पी, मुस्कान और डर को भी समझता है। बच्चों को सबसे ज़्यादा जरूरत किसी ऐसे की होती है जो उन्हें बिना जज किए सुन ले। घर में उन्हें अक्सर जल्दी, तनाव या तुलना मिलती है, लेकिन स्कूल में जब बच्चा शिक्षक के पास चुपचाप खड़ा हो जाता है, तो वह डांट नहीं—बल्कि अपनापन खोज रहा होता है। आज की तेज़ जिंदगी ने माता-पिता और बच्चों के बीच बातचीत का समय कम कर दिया है...