मैं हूँ न — अनंत कृपा दयालबाग के पावन मार्च-पास्ट में, भक्त श्रद्धा और मौन लिए खड़े। मालिक स्वयं प्रकट होते हैं, हर हृदय में प्रेम और उजास भरने को। एक झलक में मिट जाएँ सारे दुख, हर वेदना शांति में विलीन। उस क्षण केवल मालिक ही रहते हैं, बाकी सब शून्य में खो जाए। ई-व्हीकल में बैठे भी ध्यान मग्न, दया और मेहर की असीम वर्षा। हर सूर्त की सूक्ष्म पुकार सुनकर, प्रेम की दिव्य ज्योति जलाते हैं। “मैं हूँ न” — केवल शब्द नहीं, पिता की शाश्वत दया और प्रेम। टूटे मन को जोड़ने वाली, अनंत, पवित्र, दिव्य लहर। खेत सेवा में थककर भी भक्त, समर्पण में झुककर लीन। दया की शीतल वर्षा बनकर, मालिक दर्शन का अवसर देते हैं। निर्मल चेतन देश की सुवासित छाया से, जीवन पावन होकर महक उठते हैं। भटकी सुरती को उसके मूल स्वरूप से, फिर से मिलाने मालिक आते हैं। — A. K. Mehta कर्म का प्रतिबिंब जब मन किसी को दुख देने से विराम ले लेता है, तब भीतर मौन जन्म लेता है। और यदि कोई उस मौन को तोड़ने आए, तो पीड़ा शोर नहीं बनती— वह साक्षी-भाव बन जाती है। दुख देने वाला अपने ही कर्मों की छाया में उलझ जाता है, ...
Fatherhood of God & Brotherhood of Man.