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कविता-श्रृंखला : जीवन की शांत गूंज — भाग द्वितीय

कविता-श्रृंखला : जीवन की शांत गूंज — भाग द्वितीय 


मैं हूँ न — अनंत कृपा

दयालबाग के पावन मार्च-पास्ट में,
भक्त श्रद्धा और मौन लिए खड़े।
मालिक स्वयं प्रकट होते हैं,
हर हृदय में प्रेम और उजास भरने को।

एक झलक में मिट जाएँ सारे दुख,
हर वेदना शांति में विलीन।
उस क्षण केवल मालिक ही रहते हैं,
बाकी सब शून्य में खो जाए।

ई-व्हीकल में बैठे भी ध्यान मग्न,
दया और मेहर की असीम वर्षा।
हर सूर्त की सूक्ष्म पुकार सुनकर,
प्रेम की दिव्य ज्योति जलाते हैं।

“मैं हूँ न” — केवल शब्द नहीं,
पिता की शाश्वत दया और प्रेम।
टूटे मन को जोड़ने वाली,
अनंत, पवित्र, दिव्य लहर।

खेत सेवा में थककर भी भक्त,
समर्पण में झुककर लीन।
दया की शीतल वर्षा बनकर,
मालिक दर्शन का अवसर देते हैं।

निर्मल चेतन देश की सुवासित छाया से,
जीवन पावन होकर महक उठते हैं।
भटकी सुरती को उसके मूल स्वरूप से,
फिर से मिलाने मालिक आते हैं।

A. K. Mehta


कर्म का प्रतिबिंब

जब मन
किसी को दुख देने से
विराम ले लेता है,
तब भीतर
मौन जन्म लेता है।

और यदि कोई
उस मौन को तोड़ने आए,
तो पीड़ा शोर नहीं बनती—
वह साक्षी-भाव बन जाती है।

दुख देने वाला
अपने ही कर्मों की
छाया में उलझ जाता है,
और सहने वाला
हल्का होकर
ऊपर उठने लगता है।

जहाँ प्रतिकार नहीं,
वहीं करुणा की शक्ति
काम करने लगती है।

जो चोट खाकर भी
चोट नहीं देता,
समय स्वयं
उसका उत्तर बन जाता है।

— आनंद किशोर मेहता


स्थिर मन

न सुख में उड़े, न दुख में टूटे,
न आशा में बहे, न भय में डूबे।
जो हर पल खुद में स्थित रहे,
वही जीवन का अर्थ समझे।

न हार में खोए विश्वास अपना,
न जीत में बढ़ाए अहं का सपना।
जो समभाव से हर पथ चले,
वही भीतर का दीप जले।

तूफानों में भी शांत रहे,
मन की लहरें थामे रहे।
बाहर चाहे शोर मचे,
भीतर बस मौन सजे।

न कल की चिंता, न बीते का भार,
बस वर्तमान का मधुर उपहार।
जो इस क्षण में जीना जाने,
वही जीवन को सच माने।

जहाँ न “मैं” का भारी बोझ,
न “मेरा” का कोई रोग।
बस चेतना का निर्मल प्रवाह,
यही स्थिर मन की राह।

 — आनंद किशोर


तेरा ही शुक्राना — प्रार्थना

हे मेरे परमपिता,
इस पावन क्षण में
मैं श्रद्धा से तुझे नमन करता हूँ।

शुक्र है उस जीवन का
जो तूने मुझे दिया,
शुक्र है हर उस राह का
जिस पर तू मुझे चलाता है।

मेरे सुख का भी धन्यवाद,
मेरे दुख का भी धन्यवाद,
क्योंकि दोनों में तू मुझे
और अधिक श्रेष्ठ बनाता है।

जो कुछ है — तेरा है,
जो मैं हूँ — तेरा हूँ,
बस इतनी कृपा रखना दाता,
कि हर पल तेरा शुक्राना करता रहूँ।

रा धा/ध: स्व आ मी🙏


अनकहा सत्य

जब कोई समझदार बुज़ुर्ग विदा होता है,
समय अपनी सबसे अनमोल किताब बंद कर देता है।
उनकी खामोशी में सदियों की आवाज़ें थीं,
उनके शब्द जीवन को राह दिखाते थे।

वे चलते-फिरते ग्रंथ थे,
जिनके अनुभव भविष्य की रोशनी थे।
हमने उन्हें कम सुना,
समझना हमेशा कल पर टाल दिया।

आज स्मृतियों में केवल राख है,
हवा में पछतावे की गंध।
एक बुज़ुर्ग का जाना मृत्यु नहीं,
एक पूरी दुनिया का मौन है।

रा धा/ध: स्व आ मी🙏


हमारी यात्रा और सतगुरु

हम सभी हैं जीवन की अद्भुत यात्रा पर,
जहाँ मंज़िल है हमारा निज घर — शांति, प्रेम और प्रकाश का स्थल।
रास्ते कभी सरल, कभी कठिन,
फिर भी हम सुरक्षित हैं, सतगुरु की छाया में हर मोड़ पर।

परम प्रिय संत सतगुरु हैं हमारे रक्षक,
हर क्षण उनके स्नेह का अनुभव है।
थकान भी आनंद बन जाती है,
हर चुनौती हमें हमारे घर के करीब ले आती है।

धैर्य और दया व मेहर में चलता यह सफर,
सौंदर्य और विश्वास से भरा हर पल।
सतगुरु की रक्षा में, मंज़िल नज़दीक है,
यही बनाता है हमारी यात्रा को पूर्ण, सुंदर और सार्थक।

अनंद किशोर मेहता


शोर

शोर ने कहा — चल, मैं तुझे दिखाऊँ,
और ख़ामोशी ने कहा — ठहर।

हर आवाज़ रास्ता बता रही थी,
मगर मंज़िल
मौन में बैठी प्रतीक्षा कर रही थी।

मैं बहुत दूर तक
ख़ुद को ढूँढता चला गया,
और लौटकर जाना
कि मैं तो यहीं था।

शोर ने मुझे नाम दिए,
ख़ामोशी ने पहचान दी।

जिस दिन शब्दों से भरोसा टूटा,
उसी दिन
इश्क़ ने बोलना शुरू किया।

— अनंद किशोर मेहता


दर्द की समझ

क्यों कोई
बिना माँगे
इतना साथ दे देता है?

शायद इसलिए
कि उसने कभी
अकेलेपन की
पूरी भाषा पढ़ी हो।

वह जानता है
चुप्पी कैसे चुभती है,
और एक सही शब्द
कैसे मरहम बन जाता है।

वह मदद नहीं करता,
वह बस
किसी और के बोझ को
थोड़ी देर
अपने कंधे पर रख लेता है।

क्योंकि
जिसने अँधेरों में
रास्ता खोजा हो,
वह रोशनी
छुपा नहीं पाता।

कुछ लोग इसलिए मिलते हैं
कि दुनिया को बदलें नहीं,
बस
किसी एक दिल को
टूटने से
बचा लें।

— आनंद किशोर मेहता


लम्हों से परे

खुशी आती है तो जैसे सुबह की धूप—
न पूछती है,
न ठहरने का वचन देती है।

हम उसे बाँधना चाहते हैं
लम्हों की रस्सी से,
और वहीं से
मन का संतुलन
ढीला पड़ने लगता है।

खुशी का जाना
दुख नहीं है,
दुख यह है
कि उसके साथ
हम भी
गिर जाते हैं।

जिसने
आने को भी स्वीकारा,
जाने को भी—
वही जीवन की
सच्ची स्थिरता को
पहचान पाया।

— A. K. Mehta


शोर और शब्द

शोर थकाता है,
शब्द कभी राहत, कभी भ्रम देते हैं।
चुप्पी में छुपा है मार्ग,
मन वहीं अपनी दिशा पाता है।
जहाँ शांति होती है, वहीं सच्चाई।

— A. K. Mehta


आत्मसम्मान

हर रिश्ता निभाने को नहीं होता।
कुछ साथ चलते हैं,
कुछ छोड़ना सिखाते हैं।

जहाँ इज़्ज़त घटे,
वहाँ शब्द भी बेकार हो जाते हैं।
मौजूदगी बोझ बनती है,
और मन चुपचाप टूट जाता है।

आत्मसम्मान अहंकार नहीं,
यह अपनी सीमा की रक्षा है।
जो उसे मिटाने लगे,
वहाँ रुकना—खुद से गद्दारी है।

मैं बोझ बनकर नहीं ठहरूँगा।
जहाँ मेरी क़दर न हो,
वहाँ मेरी दूरी ही मेरा उत्तर है।

— आनंद किशोर मेहता


चरित्र

मैंने सम्मान को
हालात के तराज़ू पर नहीं तौला,
क्योंकि मूल्य
भीड़ तय नहीं करती।

जो मुझे तोड़ना चाहते थे,
वे अपने ही बोझ से थक गए;
मैं चुपचाप आगे बढ़ता रहा,
क्योंकि स्थिरता
सबसे ऊँची आवाज़ होती है।

सम्मान मैंने दिया,
लौटने की उम्मीद में नहीं;
बल्कि इसलिए कि
जिस स्तर पर मैं खड़ा था,
वहाँ अपमान
पहुँच ही नहीं सकता।

अंत में फर्क इतना ही था—
वे प्रतिक्रिया थे,
और मैं
निर्णय।

— A. K. Mehta


कृतज्ञता

मैं उन सबका आभारी हूँ
जिनसे मुझे ठेस लगी,
क्योंकि उन्हीं से
मेरे धैर्य ने आकार लिया।

जो साथ चले,
उन्होंने विश्वास सिखाया;
जो दूर हुए,
उन्होंने आत्मसम्मान।

सम्मान मैंने सबको दिया,
क्योंकि देना
मेरी प्रकृति है—
लौटना
उनकी यात्रा।

आज पीछे देखता हूँ तो
कोई शिकायत नहीं बची,
सिर्फ़ यह शांति है कि
मैं जैसा था,
वैसा ही
रहा।

यही मेरी जीत है। 

— A. K. Mehta


शब्दों की मधुर छाया

हर किसी के पास शब्द होते हैं,
पर हर शब्द का रंग एक-सा नहीं होता।
कहीं वे विस्तार बनकर बहते हैं,
कहीं एक पंक्ति ही
पूरा भाव धीरे से छू लेती है।

कोई शब्दों में राहें खोजता है,
कोई चुप्पी में उत्तर पा लेता है।
दोनों ही सत्य के अपने रूप हैं—
बस देखने की दृष्टि अलग है।

शब्द कोई दोष नहीं होते,
वे अनुभव की कोमल छाया होते हैं।
जिसने जैसा जिया है,
वह वैसा ही सहज कह पाता है।

कभी सच मिठास में उतरता है,
कभी हल्की कड़वाहट में।
सच वही रहता है,
केवल उसका स्वर बदल जाता है।

जब शब्द थक जाते हैं,
तो चुप्पी बोलने लगती है।
जहाँ भावना सच्ची हो,
वहाँ भाषा स्वयं
संतुलन पा लेती है।

शब्द केवल ध्वनि नहीं होते,
वे सृजन भी हैं, संवेदना भी।
और हर शब्द के पीछे
हमारी सोच
मौन खड़ी होती है।

 ~ आनंद किशोर मेहता


स्वतंत्रता

हवा की तरह आज़ाद उड़ना है,
मन की बंदिशों से ख़ुद को मुक्त करना है।

सोच की हर सीमा को पार करना है,
अंधेरों में भी अपने दीप जलाना है।

सपनों को पंख देना है,
असंभव को भी संभव बनाना है।

कदमों में राह ख़ुद बनानी है,
हर डर को पीछे छोड़ जाना है।

स्वतंत्रता सिर्फ़ अधिकार नहीं,
यह साहस, धैर्य और आत्मविश्वास की गाथा है।

जीवन को सजाना, हर पल को संवारना है,
हर कठिनाई में भी उम्मीद का सितारा है।

ख़ुद से प्यार करना, ख़ुद को जानना है,
हर रोज़ नई ऊँचाई को छूना है।

यह शक्ति है, यह कला है,
इसे जीना, इसे अपनाना — यही हमारा धर्म है।

 ~ आनंद किशोर मेहता


समझ जागी

पछतावा
एक मौन शिक्षक है,
जो शब्द नहीं—
दृष्टि बदलता है।

जो बीत गया,
वो बोझ नहीं,
अगर उससे
समझ जाग जाए।

यह आँसू नहीं,
समझ की बहती धारा है—
और वहीं से
नया मन जन्म लेता है।

A. K. Mehta


आज का सच

जिस कल से
मैं हर रात डरता रहा,
वह आज
मेरे सामने खड़ा है—
न नुकीला,
न भयानक।

डर ने उसे
ऊँचा कर दिया था,
समय ने
छोटा कर दिया।

जिन प्रश्नों के
उत्तर असंभव लगे थे,
वे आज
मौन में घुल गए।

कुछ टूटा,
कुछ छूटा,
पर जो बचा—
वही मैं हूँ।

जीत यह नहीं
कि सब ठीक हो गया,
जीत यह है
कि सब सहकर भी
मैं टूटकर
बिखरा नहीं।

आज वही कल है
जिसकी कल फ़िक्र थी—
और देखो,
मैं अब भी
खुद को
थामे खड़ा हूँ।

— आनंद किशोर मेहता


स्वयं का पथ

वे अपने फैसले स्वयं चुनते—
मन की गहराई से,
आत्मा की आवाज़ सुनकर।

ध्यान की खामोशी में
वे पूछते हैं:
“सच्चाई क्या है?”

डर, लालच और मोह को पीछे छोड़
वे केवल प्रकाश की ओर बढ़ते हैं।

हर कदम उनके लिए
कर्म भी, साधना भी,
हर निर्णय जागृति का पथ है।

जो भीतर उत्तर खोजते हैं,
वे ही सच्चे आज़ाद,
वे ही सच्चे पथिक।

— आनंद किशोर मेहता


मौन की समझ

जहाँ शब्द थककर
धीरे से रुक जाते हैं,
वहीं से अनुभव
अपनी भाषा में
बोल उठते हैं।

जो मौन में जिया गया है,
वही सत्य बनकर
अंतरात्मा में
सहलाता हुआ
डोल उठता है।

जीवन कोई शोर नहीं,
यह एक धीमी—
पर गहरी—सी सीख है।
हर उत्तर बाहर नहीं मिलता,
कुछ प्रश्न भीतर
ठहरकर परिपक्व होते हैं।

सुनना भी एक साधना है,
जो आत्मा को
विस्तार देती है।
और ठहरना भी एक कला है,
जो समय को अर्थ
और क्षणों को
गहराई प्रदान करती है।

मनुष्य वही सच में समृद्ध है,
जो स्वयं से
जुड़ जाता है।
और जो भीतर संतुलित हो जाए,
वही इस पूरे विश्व से
सहज, मौन और सच्चे रूप में
जुड़ पाता है।

— आनंद किशोर मेहता


प्रतिभा का प्रकाश

प्रतिभा का प्रकाश
न शोर करता है, न दावा —
वह शांत आकाश में
उगते सूरज-सा फैलता है।

वह अंधकार से लड़ता नहीं,
बस अपनी चमक से उसे मिटा देता है।
संदेह की दीवारें
उसकी एक किरण से ढह जाती हैं।

संघर्ष की भट्ठी में तपकर
वह और अधिक उज्ज्वल होता है;
मेहनत की हर बूंद
उसे सोने-सा निर्मल बनाती है।

जब प्रतिभा का प्रकाश प्रकट होता है,
तो राहें स्वयं आकार लेती हैं;
छोटा-सा विश्वास
वटवृक्ष बनकर छाया देता है।

प्रतिभा का प्रकाश
पहले भीतर क्रांति जगाता है,
फिर बाहर संसार को
नई दिशा दिखाता है।

— A K Mehta


विवेक की ज्योति

जहाँ क्षितिज पर गिरने की हल्की रेखा भी दिखे,
वहाँ कदमों को विनम्र विराम दे दो।
हर उजाला सूर्योदय नहीं होता,
कुछ चमकें भ्रम होती हैं—उन्हें जाने दो।

संयोगों को आकार देने से पहले,
उनकी दिशा पहचान लेना।
जो मन को कमजोर करे,
उसे आरम्भ में ही थाम लेना।

दूरी कायरता नहीं,
यह आत्मा का स्वाभिमान है।
जो समय रहते स्वयं को बचा ले,
वही जीवन का सच्चा कप्तान है।

हर लड़ाई लड़ना आवश्यक नहीं,
हर राह पर चलना भी नहीं।
सबसे महान विजय वही है—
जहाँ तुम स्वयं को खोते नहीं।

— A K Mehta


सेवा की ज्योति 

सेवा के लिए आवश्यक नहीं
कि कोई पद मिले, कोई आदेश आए।
सेवा तो अपने आप
राह बना लेती है।

जब हृदय में सेवा की अग्नि प्रज्वलित होती है,
तो कदम स्वयं आगे बढ़ जाते हैं।
वहाँ न यश की इच्छा रहती है,
न पहचान की प्रतीक्षा।

सेवा वह दीप है
जो दूसरों के लिए जलता है,
और स्वयं को भी आलोकित कर देता है।

जहाँ करुणा की धारा बहती है,
वहीं से सच्ची सेवा जन्म लेती है।

सेवा कर्तव्य नहीं—
आत्मा का उत्सव है। 

— A K Mehta


मैं अपनी राह का पथिक

मैं अपनी राह का पथिक हूँ—
निशब्द, निरभिमान, निरंतर।
मंज़िल की ओर बढ़ता जाता,
विश्वास लिए अंतर-अंतर।

न कोई मानचित्र हाथों में,
न कोई निश्चित दिशा का ज्ञान;
पर हृदय में जलता एक दीप है—
अडिग आस्था, अटल प्रमाण।

काँटों को भी चूम लिया है,
पत्थरों से सीढ़ी गढ़ी है;
हर ठोकर ने यही सिखाया—
पीड़ा में भी शक्ति छिपी है।

साथ मिले तो पथ सुहाना,
हँसता-गाता कट जाता है;
वरना धैर्य का मौन सहारा
हर संकट में संग निभाता है।

जब जग सारा दूर खड़ा हो,
और छाया भी साथ न दे—
तब अनुभव होता उस करुणामय का,
जो हर श्वास में साथ रहे।

उसी की कृपा पथ-प्रदर्शक,
उसी का प्रकाश आधार;
मैं अपनी राह का पथिक हूँ—
पर कभी नहीं लाचार।

अकेला दिखूँ भले जगत को,
पर भीतर वह सदा उपस्थित है;
मेरी हर चाल, हर साँस में
उसकी ही करुणा व्यक्त है।

— आनंद किशोर मेहता


एक ही परम शक्ति

सभी शक्तियों का स्रोत वही,
एक ही परम शक्ति, असीम।
उसके सिवा किसी को न पूजो।
अन्य की भक्ति, आत्मा का संहार है।

उठो, बैठो, हर पल उसे स्मरण करो,
हृदय में उसका जप निरंतर करो।
गुणगान उसके, स्तुति उसके,
उसकी महिमा में जीवन बसाओ।

सभी शक्तियाँ उसी के आश्रय से चलती हैं,
वह ही प्रधान, वह ही अनंत।
एक ही मालिक, एक ही शक्ति,
सभी का आधार, सभी का अंत।

— रा धा/ध: स्व आ मी


वक्त ठहर गया…

वक्त ठहर गया,
जैसे सांसें भी धीमी हो गईं,
एक पल ने सदियों का रूप ले लिया,
और खामोशी बोलने लगी।

कभी खुशी में ठहरता है,
तो कभी दर्द में जम जाता है,
पर सच तो ये है—
वक्त कभी रुकता नहीं,
बस हमारे एहसास ठहर जाते हैं।

चाहो तो इसे याद बना लो,
या नई शुरुआत का इशारा समझ लो…
क्योंकि हर ठहरा हुआ पल,
किसी नए सवेरे की आहट होता है। 

— आनंद किशोर मेहता


सतसंग की संपत्ति — सेवा और समर्पण 


📜 छोटी कविता

सतसंग की संपत्ति पावन है,
यह सबकी अमानत होती है।
अधिकार सभी जताते इस पर,
पर सेवा ही सच्ची भक्ति होती है।

उपेक्षा से जो नष्ट हो जाए,
यह श्रद्धा का अपमान है।
अपना समझकर जो संभाले,
वही सच्चा सेवक महान है।

जो इसकी रक्षा करता है,
वही समर्पण को जानता है।
सत्संग की संपत्ति की सेवा,
मालिक के पावन चरणों का सम्मान है।

🙏 सतसंग की संपत्ति — अधिकार नहीं, जिम्मेदारी भी है।

— आनंद किशोर मेहता

खुद की जीत

दूसरों की चिंता में क्यों खोना,
खुद से ही रिश्ता क्यों तोड़ना।

जो खुद को समझ लेता है,
वही जीवन को जीत लेता है।

दुनिया की राहें लंबी हैं,
पर सबसे कठिन सफर भीतर है।

खुद को सँवार लो, खुद को निखार लो,
यही सफलता का सच्चा द्वार है।

खुद पर विजय, सबसे बड़ी जीत —
यही जीवन का असली श्रृंगार है।

— आनंद किशोर मेहता


स्वतंत्रता – जीवन की रोशनी 

जहाँ स्वतंत्रता की हवा बहती है,
वहाँ हर दिल में सुकून पलता है।

बंधन टूटें, अरमान खुलें,
मन की गहराई में रोशनी झलके।

स्वतंत्रता वह मोती है,
जो अनुशासन में और अधिक चमकता है।

हर कदम में आशा बहती है,
हर सांस में जीवन की मिठास झलके।

जो इसे पाए, पाता है खुद की पहचान,
हर पल में बसती है प्रेम और शांति की जान।

आओ इसे संजोएँ, हर क्षण महसूस करें,
ताकि जीवन गीत में हमेशा यही सुर झूमें।

जहाँ अनुशासन और स्वतंत्रता साथ हों,
वहीं मनुष्य अपने सपनों को सजाए।

— आनन्द किशोर मेहता


सेवा और सतसंग 

दयालबाग में बहती दया-मेहर की धारा,
सतसंग और सेवा में खिलता हर किनारा।

सुबह-शाम तीन से सात, सात से ग्यारह समय,
प्रत्येक पल में अनुभव हो मालिक की दया-मेहर।

भाई-बहन लगाएँ मन सेवा में सारा,
चार घंटे में भी खिल जाए जीवन का प्रकाश।

घर बैठे जुड़ें ऑनलाइन माध्यम से,
मालिक की दया व मेहर से मन हो निर्मल।

सेवा में शांति, सतसंग में आनंद,
मन में खिलें दीनता का दिव्य बगान।

कर्म और भक्ति का अद्भुत संगम,
ले आए जीवन में सच्चाई का प्रकाश।

आओ मिलकर अपनाएँ यह अवसर,
दयालबाग की खेत सेवा में हर क्षण बिताएँ।

सतसंग और सेवा से जीवन हो सुखमयी।

— आनन्द किशोर मेहता


From Victim to Warrior

जब जीवन ने दर्द दिया,
तब भीतर साहस जागा।
जब हर उम्मीद टूट गई,
तब योद्धा बनकर जागा।

आँसू कमजोरी नहीं हैं,
ये शक्ति की शुरुआत हैं।
जो गिरकर फिर उठ जाए,
वही असली सौगात है।

हालातों से हारो मत,
खुद पर विश्वास बनाए रखो।
दर्द को अपनी ताकत बनाकर,
हर संघर्ष से आगे बढ़ो।

कहानी चाहे पीड़ा से लिखी हो,
पर अंत विजय में होना चाहिए।
तुम पीड़ित नहीं, एक योद्धा हो—
यह विश्वास जीवित होना चाहिए।

✍️ — A K Mehta

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