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कविता-श्रृंखला : जीवन की शांत गूंज — भाग प्रथम

जीवन की शांत गूंज  हर सुबह बिना शोर के आती है, हथेलियों में उम्मीद की कोमल रोशनी लिए। जो देख सके, वही समझ पाए— नया दिन स्वयं एक मौन संदेश है। मौन की गहराई में ही शक्ति का निवास होता है। जहाँ शब्द थक जाते हैं, वहीं आत्मा बोल उठती है। जो शांत रहकर स्वयं को थाम ले, वह तूफ़ानों में भी अपनी दिशा खोज लेता है। समय हमें बदलने नहीं, स्वयं को समझने का अवसर देता है। हर क्षण धीरे से पूछता है— क्या तुम आज कल से बेहतर हो? कम शब्द, गहरे अर्थ— यही जीवन की सच्ची भाषा है। जो एक बार स्वयं को जीत ले, उसके भीतर हार कभी ठहर नहीं पाती। और जब लगे कि सब समाप्त हो गया है, तो ठहरकर सुनना— क्योंकि हर अंत के भीतर एक नई शुरुआत शांत गूंज बनकर जन्म लेती है। — Anand Kishor Mehta जागता व्यक्तित्व अँधेरों से मत डरना, हर दिल में उजाला है। सत्य और धैर्य की राह पकड़ो, स्वयं की रोशनी जगाओ। हर कदम, हर अनुभव, तेरा दीपक और प्रखर करे। अपने व्यक्तित्व को चमकने दो, दुनिया को भी दिशा दिखाए। — आनंद किशोर मेहता सपनों के पार सुख-दुख की दुनिया से परे, जहाँ मन का शोर न पहुँचे, वहाँ उठते हैं शांत विचार, जैसे ...

क्या यह इंसानों की बस्ती है?

क्या यह इंसानों की बस्ती है?  लेखक: आनंद किशोर मेहता सुबह उम्मीद लेकर आती है। हर गली, हर मोहल्ला, हर घर—एक नई शुरुआत की संभावना से भरा होता है। हर नया दिन जीवन को बेहतर बनाने का एक अवसर लगता है। लेकिन कुछ बस्तियों में सुबह शांति नहीं, शोर लेकर आती है। कहीं गालियाँ, कहीं दरवाज़ों की पटकन। मोहल्ला घरों की जगह रोज़-रोज़ के झगड़ों का अखाड़ा बन जाता है— जहाँ न कोई सुनना चाहता है, न समझना; सब बस बोलना चाहते हैं। हताशा, कुंठा और अधूरी इच्छाएँ लोग अपने जीवन का बोझ एक-दूसरे पर फेंककर हल्का होना चाहते हैं। कोई खुद को चोट पहुँचाता है, कोई दूसरों की आवाज़ दबाकर खुद को सही साबित करता है, कोई चुप रहकर भीतर घुटता है, और कोई नशे में शांति ढूँढता है— जो कुछ देर के लिए आवाज़ें तो दबाता है, हालात नहीं। क्या यही मानवता है? क्या यही सभ्यता है? क्या इस शोर में वे मूल्य खो नहीं गए— सहनशीलता • संवाद • समझ • संयम यह केवल एक गली की कहानी नहीं। यह एक गहरी सामाजिक बीमारी का संकेत है। हम दूसरों से नहीं, खुद से असंतुष्ट हैं। रिश्ते संवाद से नहीं, चिल्लाहट से चलने लगे हैं। जीत का अर्...