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कविता-श्रृंखला : जीवन की शांत गूंज

जीवन की शांत गूंज 


हर सुबह बिना शोर के आती है,
हथेलियों में उम्मीद की कोमल रोशनी लिए। जो देख सके, वही समझ पाए— नया दिन स्वयं एक मौन संदेश है।

मौन की गहराई में ही शक्ति का निवास होता है। जहाँ शब्द थक जाते हैं, वहीं आत्मा बोल उठती है। जो शांत रहकर स्वयं को थाम ले, वह तूफ़ानों में भी अपनी दिशा खोज लेता है।

समय हमें बदलने नहीं, स्वयं को समझने का अवसर देता है। हर क्षण धीरे से पूछता है— क्या तुम आज कल से बेहतर हो?

कम शब्द, गहरे अर्थ— यही जीवन की सच्ची भाषा है। जो एक बार स्वयं को जीत ले, उसके भीतर हार कभी ठहर नहीं पाती।

और जब लगे कि सब समाप्त हो गया है, तो ठहरकर सुनना— क्योंकि हर अंत के भीतर एक नई शुरुआत शांत गूंज बनकर जन्म लेती है।

— Anand Kishor Mehta


नम्रता का शिखर — प्रेम का ध्वज 

मैं इतना झुका,
इतना सरल, इतना विनम्र हुआ
कि संसार की चंचल दृष्टि भी
एक पल को ठहर गई।

यदि अब भी कोई
और झुकाने की चाह रखता हो—
तो बस एक मौन संकेत देना;
शायद मैं पथ से डगमगा गया हूँ,
ताकि अपनी ही अंतर-रोशनी में
फिर से सही दिशा पहचान सकूँ।

और जब नम्रता की
हर कसौटी पूर्ण हो जाए,
तो आओ—सब मिलकर
Ra Dha Sva Aa Mi 🙏

दयाल के पावन संदेश को
प्रेम की धारा,
शांति की श्वास
और मालिक की दया–मेहर की
अनंत सुगंध संग
संपूर्ण विश्व में प्रवाहित करें।

उन्नत कर दें वह ध्वज
जो करुणा का प्रतीक है—
उसे इतना गगनचुंबी बना दें
कि वह केवल धरती पर नहीं,
संपूर्ण ब्रह्मांड में
झूमता, लहराता,
प्रेम का उद्घोष करे।


जागता व्यक्तित्व

अँधेरों से मत डरना,
हर दिल में उजाला है।
सत्य और धैर्य की राह पकड़ो,
स्वयं की रोशनी जगाओ।

हर कदम, हर अनुभव,
तेरा दीपक और प्रखर करे।
अपने व्यक्तित्व को चमकने दो,
दुनिया को भी दिशा दिखाए।

— आनंद किशोर मेहता


सपनों के पार

सुख-दुख की दुनिया से परे,
जहाँ मन का शोर न पहुँचे,
वहाँ उठते हैं शांत विचार,
जैसे सागर की लहरें, धीरे-धीरे बहें।

अंतर्मन की गहराई में,
एक प्रकाश हमेशा जलता है,
छोटे-छोटे क्षणों में भी,
सत्य का दीपक चमकता है।

विलास और पीड़ा से परे,
जहाँ केवल प्रेम ही शेष है,
वहाँ आत्मा की अनंत यात्रा,
हर पल नए फूल खिले जैसे।

हर सांस में नए अनुभव,
हर दिल में नई राह,
चलते रहो, खोजते रहो,
यही जीवन की सबसे बड़ी चाह।

— आनंद किशोर मेहता


अंतर्मन की राह

अंधेरे में दिल बुझे,
हर सांस में बेचैनी उठे।
दर्द की लहरें उठें,
जैसे तूफान बिना किनारे के।

फिर भी एक प्रकाश झलके,
सत्य की राह दिखाए।
धीरे-धीरे कदम बढ़ाओ,
हर जख्म सिखाता है, हर आँसू बहाता है।

सत्य, प्रेम और धैर्य की राह पकड़ो,
रूह को मिले शांति, मन को मिले शांति।

— आनंद किशोर मेहता


दर्द भरी प्रार्थना

हे ईश्वर,
मेरे भीतर की बेचैनी सुन लो।
मेरे जख्म गहरे हैं,
आँसू चुपचाप बहते हैं,
फिर भी मैं थमना नहीं चाहता।

मुझे सत्य की राह दिखाओ,
जहाँ दर्द मुझे तोड़ न सके,
जहाँ हर आँसू मुझे और मजबूत बनाए।

मेरी रूह को शांति दो,
मेरे मन को सुकून दो,
ताकि अंधेरे में भी
मैं रोशनी देख सकूँ।

— आनंद किशोर मेहता


सतसंग- सेवा की शक्ति

हम काल की शक्ति, मन और माया से लड़ेंगे,
क्योंकि हमारे भीतर दिव्य प्रकाश सदा जाग्रत है।
परम पिता, मालिक जी ने जो शक्ति हमें अर्पित की,
वही अँधेरों में दीप बनकर प्रकट है।

जब मन की उलझनों में हम स्वयं को खो दें,
और माया के मोह में राह भटक जाए,
तो स्मरण रहे—भीतर की वह रोशनी अनंत है,
सत्संग और सेवा से जो और गहरी हो जाए।

हर कदम पर, हर अनुभव के साथ,
हमारा दीप अँधेरों को चीरता चलता है।
विश्वास और साहस के साथ उस शक्ति को अपनाकर,
काल, मन और माया पर विजय पाकर,
हम जीवन में प्रकाश फैलाते चले जाते हैं।

— आनंद किशोर मेहता


आदर्श व्यक्तित्व

समय का सम्मान, वादों की पाबंदी,
हर कदम में रहे आत्म-सम्मान की गहराई।

विनम्रता शब्दों में झलके,
शालीनता व्यवहार में दिखे,
सकारात्मकता बहती रहे
हर विचार के हर मोड़ में।

दूसरों की राय को समझो,
पर अपनी सोच को भी मूल्यवान रखो।
हर चुनौती में रखो साहस,
और अपने लक्ष्य तक पहुँचो।

स्वस्थ तन, स्वस्थ मन,
और ज्ञान का संगम—
यही है जीवन का उज्ज्वल मार्ग।

जो खड़ा हो तुम्हारे साथ,
वह महसूस करे गौरव महान,
ऐसी हो तुम्हारी पहचान—
यही है जीवन का सच्चा पथप्रदर्शन।

— Anand Kishor Mehta


साहस और संकल्प 

डर की छाया जब गहरी हो जाए,
हिम्मत की लौ तभी जलानी होती है।
रास्ते खुद नहीं बनते जीवन में,
उन्हें संकल्प की धूप दिखानी होती है।

ठोकरें कहती हैं—रुक जाओ यहीं,
पर साहस कहता है—एक कदम और।
हार से डरकर जो मुड़ जाते हैं,
वे कैसे देखें मंज़िल का छोर।

सपने सच होते हैं शोर से नहीं,
चुपचाप किए गए विश्वास से।
हर दिन खुद से किया वादा निभाना,
यही जीत है हर प्रयास से।

जो गिरकर फिर से उठना जान गया,
वही जीवन का अर्थ समझ पाया।
साहस और संकल्प के इस पथ पर,
हर साधारण मनुष्य असाधारण बन पाया।

— Anand Kishor Mehta


जीवन मूल्यों का दीपक

ईमानदारी की लौ जलाए रखो,
सत्य और सच्चाई से राह सजाए रखो।

दयालुता का प्रकाश हर दिल में फैलाओ,
और सम्मान से हर रिश्ते को निभाओ।

छोटे कर्मों में बड़ा अर्थ खोजो,
हर चुनौती में धैर्य और साहस को लो।

संस्कारों से निखरे हर विचार,
यही है जीवन का सच्चा आधार।

जो अपने मूल्यों पर अडिग खड़ा हो,
वह हर अँधेर में भी दीपक बनता हो।

ऐसा जीवन ही सच्चा जीवन कहलाए,
मूल्यों के प्रकाश से हर दिशा जगमगाए।

— Anand Kishor Mehta


सूरत की राह

सेवा से मन निर्मल होता,
सत्संग से पथ मिल जाता।
मैं का बोझ जब उतर जाए,
भीतर दीप जल जाता।

गुरु-वाणी की मधुर धारा,
अंतर को शीतल कर दे।
शब्द-सुर में सूरत डूबे,
आत्मा खुद को पढ़ ले।

न मंदिर की दीवारें ऊँची,
न मस्जिद का कोई भेद।
प्रेम जहाँ बस जाए मन में,
वही सच्चा उपदेश।

शीश झुका तो अनंत मिला,
सेवा बनी पहचान।
अंत नहीं यह, आरंभ है,
निज घर में विश्राम पाई।

— आनंद किशोर मेहता


विलासिता

विलासिता महँगे सपनों का नाम नहीं,
न चमकते शीशों की चकाचौंध,
न सोने के जाम की पहचान।
वह तो वह सादगी है
जहाँ जीवन बोझ नहीं लगता।

जहाँ समय ठहरकर साँस ले,
और मन जल्दबाज़ी भूल जाए।
जहाँ कम में भी संतोष जागे,
और अधिक की लालसा सो जाए।

विलासिता है
वर्तमान में पूर्ण होना,
हर क्षण को
पूरी चेतना से जी पाना।

न वस्तुओं की भीड़ चाहिए,
न दिखावे की ऊँची दीवारें।
जब जीवन सहज और सुंदर हो जाए—
वही हैं
विलासिता की असली धाराएँ।

— आनंद किशोर मेहता


सच्चा प्रेम

प्रेम वह नहीं जो साँसें छीन ले,
प्रेम वह है जो आत्मा को जीवित कर दे।

सच्चा प्रेम बनाता है बेहतर,
ले जाता है ईश्वर के निकट।

यदि चोट पहुँचाए आत्म-सम्मान को,
तो वह प्रेम नहीं—बस जंजीर है।

असंयमित प्रेम क्षणिक ज्वाला,
सच्चा प्रेम बुनता है स्थायी आनंद।

जब ईश्वर की खुशबू चली जाए,
तो प्रेम बस आसक्ति बन जाता है।

सच्चा प्रेम उठाता है आत्मा को ऊपर,
कभी नहीं बाँधता परछाई में।

— आनंद किशोर मेहता


विवेक और सौंदर्य

हर चमक… अमृत नहीं होती,
हर सुंदरता… भरोसे की नहीं।
जो बस आँखों को भा जाए,
वह आत्मा के काम की नहीं।

सौंदर्य… एक क्षणिक परछाईं है,
विवेक… उसकी स्थायी रोशनी।
जहाँ विवेक साथ न चले,
वहीं सुंदरता… बन जाती है भ्रांति।

समझ के हाथों थामी जाए,
तो रूप भी… साधना बन जाए।
मोह की पकड़ में जो फँसे,
वही भीतर को… खाली कर जाए।

इसलिए नकारो मत सुंदरता,
बस उसे रखो… विवेक के संग।
तभी जीवन में सौंदर्य,
मूल्य बनेगा—
भ्रम नहीं… मंगल नहीं, संतुलन बनेगा।

— आनंद किशोर मेहता


आत्मसम्मान

आत्मसम्मान शोर नहीं करता,
वह चुपचाप अपनी सीमा जानता है।
न क्रोध में बहता है,
न बदले की राह अपनाता है।

वह झुकना भी जानता है,
पर टूटना नहीं सिखाता।
मर्यादा की छाया में रहकर
दृढ़ रहना सिखाता है।

न वह किसी को छोटा करता है,
न स्वयं को ऊँचा बताता है।
शांत स्वर में कहता है—
“मैं हूँ, और इतना ही पर्याप्त है।”

जहाँ शब्द संयम से निकलें,
और दृष्टि साफ़ बनी रहे,
वहीं आत्मसम्मान
अपना सबसे सुंदर रूप धरे।

— आनंद किशोर मेहता


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