हर सुबह बिना शोर के आती है,
हथेलियों में उम्मीद की कोमल रोशनी लिए। जो देख सके, वही समझ पाए— नया दिन स्वयं एक मौन संदेश है।
मौन की गहराई में ही शक्ति का निवास होता है। जहाँ शब्द थक जाते हैं, वहीं आत्मा बोल उठती है। जो शांत रहकर स्वयं को थाम ले, वह तूफ़ानों में भी अपनी दिशा खोज लेता है।
समय हमें बदलने नहीं, स्वयं को समझने का अवसर देता है। हर क्षण धीरे से पूछता है— क्या तुम आज कल से बेहतर हो?
कम शब्द, गहरे अर्थ— यही जीवन की सच्ची भाषा है। जो एक बार स्वयं को जीत ले, उसके भीतर हार कभी ठहर नहीं पाती।
और जब लगे कि सब समाप्त हो गया है, तो ठहरकर सुनना— क्योंकि हर अंत के भीतर एक नई शुरुआत शांत गूंज बनकर जन्म लेती है।
— Anand Kishor Mehta
जागता व्यक्तित्व
अँधेरों से मत डरना,
हर दिल में उजाला है।
सत्य और धैर्य की राह पकड़ो,
स्वयं की रोशनी जगाओ।
हर कदम, हर अनुभव,
तेरा दीपक और प्रखर करे।
अपने व्यक्तित्व को चमकने दो,
दुनिया को भी दिशा दिखाए।
— आनंद किशोर मेहता
सपनों के पार
सुख-दुख की दुनिया से परे,
जहाँ मन का शोर न पहुँचे,
वहाँ उठते हैं शांत विचार,
जैसे सागर की लहरें, धीरे-धीरे बहें।
अंतर्मन की गहराई में,
एक प्रकाश हमेशा जलता है,
छोटे-छोटे क्षणों में भी,
सत्य का दीपक चमकता है।
विलास और पीड़ा से परे,
जहाँ केवल प्रेम ही शेष है,
वहाँ आत्मा की अनंत यात्रा,
हर पल नए फूल खिले जैसे।
हर सांस में नए अनुभव,
हर दिल में नई राह,
चलते रहो, खोजते रहो,
यही जीवन की सबसे बड़ी चाह।
— आनंद किशोर मेहता
अंतर्मन की राह
अंधेरे में दिल बुझे,
हर सांस में बेचैनी उठे।
दर्द की लहरें उठें,
जैसे तूफान बिना किनारे के।
फिर भी एक प्रकाश झलके,
सत्य की राह दिखाए।
धीरे-धीरे कदम बढ़ाओ,
हर जख्म सिखाता है, हर आँसू बहाता है।
सत्य, प्रेम और धैर्य की राह पकड़ो,
रूह को मिले शांति, मन को मिले शांति।
— आनंद किशोर मेहता
दर्द भरी प्रार्थना
हे ईश्वर,
मेरे भीतर की बेचैनी सुन लो।
मेरे जख्म गहरे हैं,
आँसू चुपचाप बहते हैं,
फिर भी मैं थमना नहीं चाहता।
मुझे सत्य की राह दिखाओ,
जहाँ दर्द मुझे तोड़ न सके,
जहाँ हर आँसू मुझे और मजबूत बनाए।
मेरी रूह को शांति दो,
मेरे मन को सुकून दो,
ताकि अंधेरे में भी
मैं रोशनी देख सकूँ।
— आनंद किशोर मेहता
आदर्श व्यक्तित्व
समय का सम्मान, वादों की पाबंदी,
हर कदम में रहे आत्म-सम्मान की गहराई।
विनम्रता शब्दों में झलके,
शालीनता व्यवहार में दिखे,
सकारात्मकता बहती रहे
हर विचार के हर मोड़ में।
दूसरों की राय को समझो,
पर अपनी सोच को भी मूल्यवान रखो।
हर चुनौती में रखो साहस,
और अपने लक्ष्य तक पहुँचो।
स्वस्थ तन, स्वस्थ मन,
और ज्ञान का संगम—
यही है जीवन का उज्ज्वल मार्ग।
जो खड़ा हो तुम्हारे साथ,
वह महसूस करे गौरव महान,
ऐसी हो तुम्हारी पहचान—
यही है जीवन का सच्चा पथप्रदर्शन।
— Anand Kishor Mehta
साहस और संकल्प
डर की छाया जब गहरी हो जाए,
हिम्मत की लौ तभी जलानी होती है।
रास्ते खुद नहीं बनते जीवन में,
उन्हें संकल्प की धूप दिखानी होती है।
ठोकरें कहती हैं—रुक जाओ यहीं,
पर साहस कहता है—एक कदम और।
हार से डरकर जो मुड़ जाते हैं,
वे कैसे देखें मंज़िल का छोर।
सपने सच होते हैं शोर से नहीं,
चुपचाप किए गए विश्वास से।
हर दिन खुद से किया वादा निभाना,
यही जीत है हर प्रयास से।
जो गिरकर फिर से उठना जान गया,
वही जीवन का अर्थ समझ पाया।
साहस और संकल्प के इस पथ पर,
हर साधारण मनुष्य असाधारण बन पाया।
— Anand Kishor Mehta
जीवन मूल्यों का दीपक
ईमानदारी की लौ जलाए रखो,
सत्य और सच्चाई से राह सजाए रखो।
दयालुता का प्रकाश हर दिल में फैलाओ,
और सम्मान से हर रिश्ते को निभाओ।
छोटे कर्मों में बड़ा अर्थ खोजो,
हर चुनौती में धैर्य और साहस को लो।
संस्कारों से निखरे हर विचार,
यही है जीवन का सच्चा आधार।
जो अपने मूल्यों पर अडिग खड़ा हो,
वह हर अँधेर में भी दीपक बनता हो।
ऐसा जीवन ही सच्चा जीवन कहलाए,
मूल्यों के प्रकाश से हर दिशा जगमगाए।
— Anand Kishor Mehta
सूरत की राह
सेवा से मन निर्मल होता,
सत्संग से पथ मिल जाता।
मैं का बोझ जब उतर जाए,
भीतर दीप जल जाता।
गुरु-वाणी की मधुर धारा,
अंतर को शीतल कर दे।
शब्द-सुर में सूरत डूबे,
आत्मा खुद को पढ़ ले।
न मंदिर की दीवारें ऊँची,
न मस्जिद का कोई भेद।
प्रेम जहाँ बस जाए मन में,
वही सच्चा उपदेश।
शीश झुका तो अनंत मिला,
सेवा बनी पहचान।
अंत नहीं यह, आरंभ है,
निज घर में विश्राम पाई।
— आनंद किशोर मेहता
विलासिता
विलासिता महँगे सपनों का नाम नहीं,
न चमकते शीशों की चकाचौंध,
न सोने के जाम की पहचान।
वह तो वह सादगी है
जहाँ जीवन बोझ नहीं लगता।
जहाँ समय ठहरकर साँस ले,
और मन जल्दबाज़ी भूल जाए।
जहाँ कम में भी संतोष जागे,
और अधिक की लालसा सो जाए।
विलासिता है
वर्तमान में पूर्ण होना,
हर क्षण को
पूरी चेतना से जी पाना।
न वस्तुओं की भीड़ चाहिए,
न दिखावे की ऊँची दीवारें।
जब जीवन सहज और सुंदर हो जाए—
वही हैं
विलासिता की असली धाराएँ।
— आनंद किशोर मेहता
सच्चा प्रेम
प्रेम वह नहीं जो साँसें छीन ले,
प्रेम वह है जो आत्मा को जीवित कर दे।
सच्चा प्रेम बनाता है बेहतर,
ले जाता है ईश्वर के निकट।
यदि चोट पहुँचाए आत्म-सम्मान को,
तो वह प्रेम नहीं—बस जंजीर है।
असंयमित प्रेम क्षणिक ज्वाला,
सच्चा प्रेम बुनता है स्थायी आनंद।
जब ईश्वर की खुशबू चली जाए,
तो प्रेम बस आसक्ति बन जाता है।
सच्चा प्रेम उठाता है आत्मा को ऊपर,
कभी नहीं बाँधता परछाई में।
— आनंद किशोर मेहता
विवेक और सौंदर्य
हर चमक… अमृत नहीं होती,
हर सुंदरता… भरोसे की नहीं।
जो बस आँखों को भा जाए,
वह आत्मा के काम की नहीं।
सौंदर्य… एक क्षणिक परछाईं है,
विवेक… उसकी स्थायी रोशनी।
जहाँ विवेक साथ न चले,
वहीं सुंदरता… बन जाती है भ्रांति।
समझ के हाथों थामी जाए,
तो रूप भी… साधना बन जाए।
मोह की पकड़ में जो फँसे,
वही भीतर को… खाली कर जाए।
इसलिए नकारो मत सुंदरता,
बस उसे रखो… विवेक के संग।
तभी जीवन में सौंदर्य,
मूल्य बनेगा—
भ्रम नहीं… मंगल नहीं, संतुलन बनेगा।
— आनंद किशोर मेहता
आत्मसम्मान
आत्मसम्मान शोर नहीं करता,
वह चुपचाप अपनी सीमा जानता है।
न क्रोध में बहता है,
न बदले की राह अपनाता है।
वह झुकना भी जानता है,
पर टूटना नहीं सिखाता।
मर्यादा की छाया में रहकर
दृढ़ रहना सिखाता है।
न वह किसी को छोटा करता है,
न स्वयं को ऊँचा बताता है।
शांत स्वर में कहता है—
“मैं हूँ, और इतना ही पर्याप्त है।”
जहाँ शब्द संयम से निकलें,
और दृष्टि साफ़ बनी रहे,
वहीं आत्मसम्मान
अपना सबसे सुंदर रूप धरे।
— आनंद किशोर मेहता
जो था ही नहीं
जहाँ शब्द थक गए,
वहाँ एक आवाज़
बिना ध्वनि के उठी।
नाम गिरा,
पहचान फिसली,
फिर भी कुछ बचा रहा—
जो था ही नहीं।
जो चल रहा था,
रुक गया,
और जो रुका था,
वही आगे बढ़ गया।
वहाँ कोई “मैं” नहीं था,
कोई कहने वाला नहीं था,
फिर भी
सब कुछ
उसी से घटित हुआ।
समय रुका नहीं,
पर कहीं पहुँचा भी नहीं।
अंत से पहले ही,
सब कुछ पूर्ण हो गया।
— आनंद किशोर मेहता
सत्संग और सेवा की शक्ति
हम काल, मन और माया से लड़ेंगे,
क्योंकि भीतर का दिव्य दीप हमेशा जाग्रत है।
परम पिता ने जो शक्ति हमें दी,
वही अँधेरों में हमारा प्रकाश बनती है।
जब मन उलझनों में खो जाए,
और माया के मोह में राह भटक जाए,
तो याद रहे—भीतर की रोशनी अनंत है।
सत्संग और सेवा से यह और गहरी होती है।
हर कदम पर, हर अनुभव में,
हमारा दीप अँधेरों को चीरता चलता है।
विश्वास और साहस के साथ उस शक्ति को अपनाएं,
काल, मन और माया पर विजय पाएं,
और जीवन में उजाला फैलाते जाएँ।
— आनंद किशोर मेहता
रुकने की कला
अब बस ठहरो—
समय की धारा को महसूस करो,
हर सांस में कोई अनकहा सच धड़कता है।
थकान की इस खामोशी में सुनो,
मन के बंद दरवाज़े
अपने आप खुलने लगते हैं।
जो छोटे-छोटे पल
अक्सर नज़रअंदाज़ हो जाते हैं,
उन्हीं से जीवन
अपनी असली कहानी रचता है।
नींद की परतों में छुपा है वह सुकून
जो जागी आँखों को
अक्सर दिखाई नहीं देता।
हर ठहराव
एक मौन संदेश है,
हर रुकावट
एक नया अवसर।
सोते हुए भी आत्मा
गहराइयों में भटकती है,
और लौटती है
नए रंगों के साथ।
रुकना कमजोरी नहीं—
यह शक्ति है,
अदृश्य हाथ
आगे बढ़ने की तैयारी कर रहे हैं।
और जब कदम फिर उठेंगे,
तो रास्ता
खुद रोशनी बन जाएगा।
— आनंद किशोर मेहता
साक्षी
मैं ठहरकर देखता हूँ
अपने मन की भीड़—
भाव आते और जाते हैं,
जैसे आकाश में तैरते बादल।
न सुख मुझे बाँधता है, न दुख मुझे हिलाता है;
मैं केवल देखता हूँ—
न डरा, न रुका, न लिप्त।
भीतर शब्द शोर मचाते हैं,
पर एक मौन है जो सुनता है।
वही मौन—
साक्षी—
जो हर हलचल में अडिग,
स्थिर और शुद्ध रहता है।
जब मैं साक्षी बन जाता हूँ,
‘मैं’ कहीं खो जाता है।
बस शांति शेष रह जाती है,
और जीवन अपने सहज प्रवाह में बहता है,
निर्बाध, निर्लिप्त, पूर्ण।
— आनन्द किशोर मेहता
बसंत आया
बसंत आया—
हवा में फूलों की खुशबू,
मन में शांति की हलचल।
ओस की चमक,
पत्तों की मुस्कान—
भीतर की आत्मा भी खिल उठी।
‘मैं’ कहीं नहीं रहा,
सिर्फ शुद्ध आनंद और मौन शेष।
— आनन्द किशोर मेहता
रिश्तों की सच्चाई
लोगों की बातें मत सुनो,
उनकी आवाज़ में मत खो जाओ।
रिश्तों को किसी के हाथों मत छोड़ो,
बस अपने दिल से संभालो।
अच्छे रिश्ते नजरों से नहीं देखे जाते,
ना तारीफ से, ना आलोचना से।
वे बस महसूस किए जाते हैं,
दिल से निभाए जाते हैं।
सच्चा साथ शब्दों से नहीं टूटता,
वो केवल दिल में अडिग रहता है।
जो रिश्ते दिल से निभाए जाते हैं,
वे हमेशा अपने पूरे रंग में खिलते हैं।
— आनन्द किशोर मेहता
मेरी सीख
जो कुछ भी मैंने खोया,
वो मेरी नादानी थी।
हर गलती, हर ठोकर,
बस मेरे भीतर की कहानी थी।
जो कुछ भी पाया,
वो साहब की मेहरबानी थी।
हर खुशी, हर उपहार,
उसकी कृपा की निशानी थी।
रास्ते कठिन थे,
पर हर कदम में सीख छुपी थी।
हर आँसू ने मुझे सजग बनाया,
हर मुस्कान ने मुझे आभास कराया।
अब मैं शांत हूँ,
अब मैं समझ गया हूँ—
खोने में भी वरदान है,
पाने में भी अनमोल उपहार है।
— आनन्द किशोर मेहता
काल और साक्षी
काल बहता है—
नदी की तरह,
अनुभूतियाँ आती-जाती हैं
लहरों-सी।
सुख ठहरता नहीं,
दुःख टिकता नहीं,
नाम और रूप
क्षणिक अतिथि हैं।
जो देखा जाता है,
वह बदलता है;
पर जो साक्षी है—
वह मौन में अडिग है।
काल चलता रहता है,
अनुभूति मिट जाती है,
पर साक्षी—
न आता है,
न जाता है।
वही शाश्वत,
वही सत्य।
— आनन्द किशोर मेहता
शुभ बसंत
फूलों ने फिर से
खिलना सीखा है,
हवा ने पहनी
मृदु सुगंध।
डाल-डाल पर
जीवन की आहट है,
धरती ने
मुस्कुराना याद किया है।
पर बसंत
केवल बाहर नहीं आया—
वह भीतर भी उतरा है
मौन के द्वार से।
काल बहता रहा,
ऋतुएँ बदलीं,
अनुभूतियाँ
आईं और चली गईं।
जो खिला,
वह मुरझाया भी;
जो गूँजा,
वह थम भी गया।
पर भीतर
एक साक्षी है—
जिस पर न पतझड़ का असर,
न बसंत का अभिमान।
वहीं
सदा बसंत है,
जहाँ चेतना
स्वयं को देखती है।
— आनन्द किशोर मेहता
वर्तमान का स्पर्श
आज
कोई बड़ा सपना नहीं माँगा,
बस इतना ही—
कि साँसें अपने वक़्त पर चलें,
और मन बिना शोर के ठहर सके।
जो मिला,
उसे बोझ नहीं बनाया,
जो नहीं मिला,
उसे दोष नहीं दिया।
आज
थोड़ा सा सूरज भीतर उतरा,
थोड़ी सी हवा ने
नाम लेकर बुलाया।
कल की जल्दी नहीं,
बीते का पछतावा नहीं—
आज
बस आज को
पूरी तरह जिया।
— Anand Kishor Mehta
सोच का प्रतिबिंब
सुख और दुख हमारी सोच में ही जन्म लेते हैं,
परिस्थितियाँ तो बस
मौन घटनाएँ होती हैं।
एक ही हालात में
कोई टूट जाता है,
और कोई समझदार बन जाता है—
अंतर बस देखने का है।
जहाँ सोच स्वीकार में ठहर जाए,
वहाँ दुख भी हल्का हो जाता है।
और जहाँ सोच अपेक्षाओं में उलझ जाए,
वहाँ सुख भी बोझ बन जाता है।
हालात हर बार नहीं बदलते,
पर सोच बदलते ही
जीवन का स्वाद बदल जाता है।
— Anand Kishor Mehta
रज़ा में रज़ा
मालिक जैसे भी रखे,
हमें खुश रहना है,
क्योंकि हर हाल में
तेरी मर्ज़ी का हाथ है।
जो मिला—वह भी तेरा प्रसाद,
जो छूटा—वह भी तेरी सीख।
शिकायत का भार नहीं उठाना,
बस तेरी राह में रहना ठीक।
मेरी चाहें अब मौन रहें,
तेरी रज़ा ही मेरी रज़ा हो।
जहाँ तू चाहे, जैसे तू रखे,
बस मन में शांति की भाषा हो।
— Anand Kishor Mehta
समय के पार—एक क्षण
आज को समझ लिया
तो बहुत कुछ सुलझ गया—
कल की बेचैनी
और बीते कल का बोझ
दोनों चुपचाप उतर गए।
न भविष्य की हड़बड़ी रही,
न स्मृतियों का शोर,
इस एक क्षण में
जीवन ने
अपना पूरा अर्थ खोल दिया।
जो था, वही पर्याप्त लगा,
जो नहीं था—उसकी कमी भी नहीं रही।
आज में ठहरते ही
मन ने जाना,
शांति कोई दूर की मंज़िल नहीं—
यही, अभी की अनुभूति है।
— आनन्द किशोर मेहता
सुरमय संगम का स्वर
ईश्वर के कार्य में
बुद्धि की नहीं,
भाव की गति देखी जाती है—
रोक नहीं, प्रवाह बनो।
जहाँ सोच के जाल फँसे,
वहाँ आत्मा थम जाती है,
पर भावना का सहज प्रवाह
हर द्वार खोल देता है।
मन की सीमाएँ मिट जाती हैं,
जब दिल की धड़कन सरल हो,
बुद्धि जहाँ ठहर जाए,
भाव वहाँ आगे बढ़े,
और जीवन बन जाए—
एक सुरमय संगम का स्वर।
रोकना नहीं—
बस बहते रहो,
क्योंकि ईश्वर के काम में
जो चल रहा है,
वही सही दिशा है।
— Anand Kishor Mehta
मालिक की मौज में स्थिर
हे मालिक,
मैं माँग लेकर नहीं आया,
मेरे हाथ खाली हैं,
पर भरोसा भरा है।
जो मिला—वह भी तेरा,
जो छूटा—वह भी तेरी सीख है।
बस इतना ही चाहता हूँ—
जो तूने मेरे भीतर रचा है,
वह किसी चिंता की धूल में
ढक न जाए।
दुनिया की आवाज़ें तेज़ हों,
पर भीतर की सच्चाई
कभी मंद न पड़े।
आमदनी घटे या बढ़े,
राह कठिन हो या सरल,
मेरी अंतरात्मा से
मुझे अलग न होने देना।
कदम लड़खड़ाएँ तो संभाल लेना,
मन डगमगाए तो थाम लेना।
अगर यह समय परीक्षा है,
तो मुझे टूटने मत देना—
मुझे टिकना सिखा देना।
मुझे इतना गहरा कर देना
कि हर कठिनाई
मेरे ऊपर से निकल जाए।
शेष जो भी हो,
जैसा भी हो,
तेरी मौज से ही हो—
क्योंकि
मैं अब भी
तेरी मौज में स्थिर हूँ।
— Anand Kishor Mehta
सेवा से बड़ा मत न हो
मतभेद स्वाभाविक हैं,
पर सेवा उनसे बड़ी होनी चाहिए।
जब सेवा सहमति की शर्त पर चलती है,
तो वह सेवा नहीं—
केवल सुविधा बन जाती है।
जिस हृदय में
मालिक की सेवा की अग्नि न हो,
वह भूमि उपजाऊ दिखकर भी
बंजर ही रहती है।
कोई दोष एक का नहीं,
हम सबने मिलकर
सेवा को अपने मतों से छोटा कर दिया।
सच्ची सेवा वही है
जो अहं से ऊपर,
मतभेदों से परे,
समर्पण और धैर्य की राह पर चलती रहे।
— Anand Kishor Mehta
नम्रता का शिखर
मैं इतना झुका
कि भीतर का शोर थम गया
और दृष्टि को दिशा मिल गई।
यदि अब भी झुकना शेष हो,
तो मौन संकेत ही पर्याप्त है—
मैं अपनी अंतर-ज्योति में
फिर से स्वयं को सम्हाल लूँगा।
और जब नम्रता पूर्ण हो जाए,
तो Ra Dha Sva Aa Mi 🙏
प्रेम, शांति
और मालिक की दया-मेहर
स्वतः ही
संपूर्ण सृष्टि में
प्रवाहित हो जाए।
— Anand Kishor Mehta
सत्संग का दीप
विकास के कदम बढ़ाओ,
रास्ता कोई न रोके।
अहंकार पीछे रहे,
सत्य और भक्ति का दीप हर जगह रोशन हो।
मार्गदर्शक दिखाए उजाला,
साथ चलो, पीछे न हटो।
सच्चा साधक डरता नहीं,
सेवा और प्रयास में विश्वास रखो।
सत्संग का फूल तभी महके,
जब प्रेम और श्रद्धा सबमें भरी हो।
प्रगति की राह में बाधा न आए,
सत्य और दया की ज्योति सब में रोशन रहे।
दीप जलाएँ,
सत्संग का उजियारा हर दिशा में फैलाएँ।
— Anand Kishor Mehta
परमात्मा — सबसे निकट
इस संसार में कोई स्थायी अपना नहीं,
हर रिश्ता समय में ढल जाता है।
भीतर जो निश्चल साक्षी बैठा है,
वही हर पल साथ निभाता है।
जब विश्वास बिखरने लगते हैं,
और अपने दूर हो जाते हैं,
तब परमात्मा मौन में रहकर भी
सबसे गहराई से पास आते हैं।
दुनिया साथ छोड़े तो छोड़ दे,
उसका प्रेम कभी घटता नहीं।
इसलिए उसी को अपना मानो,
अंत तक वही साथ रहता है।
— Anand Kishor Mehta
मस्त रहो — जागरूक रहो
मस्त रहो—
पर चेतना मत खोना।
न गलत करना,
न गलत सहना।
दुःख आए तो ठहर जाना,
भागना नहीं।
उसे भोगकर समझ लेना,
वही तुम्हें गढ़ता कहीं।
अन्याय के आगे मत झुकना,
और क्रोध को मत पालना।
इन दोनों के बीच संतुलन में,
मस्त रहना सीख जाना।
— Anand Kishor Mehta
अंत तक साथ
राहों में ठोकरें खाईं,
कदम-कदम पर दर्द सहा।
जब दुनिया ने साथ छोड़ा,
अकेलापन ही साथी बना।
भीतर की आवाज़ ने कहा—
“जो सदा साथ है, वही सच्चा अपना।”
सब रास्ते थम गए,
पर मालिक ने हाथ थामा।
ठोकरें सिखाती हैं यह सत्य—
जो सब छोड़ दें,
वह कभी साथ नहीं छोड़ता।
— Anand Kishor Mehta
चल पड़ो
सोच की परछाइयों से निकलकर
संकल्प की धूप में
चल पड़ो।
देखते रहने का नहीं,
अंतरात्मा की धीमी पुकार पर
चल पड़ो।
जागना केवल नींद का टूटना नहीं,
यह भीतर सोई जिम्मेदारी का
आँख खोलना है।
परिवर्तन शोर में नहीं पलता,
वह मौन कर्मों की
गोद में बढ़ता है।
इतिहास कोई बोझ नहीं,
वह अनुभव का दीप है
जो अँधेरों में रास्ता दिखाता है।
राष्ट्र ईंट-पत्थर नहीं,
विश्वास और संकल्प की
साँस लेती चेतना है।
जो थमता है,
वह समय की धारा में
पीछे रह जाता है।
जो चल पड़ता है,
वह भविष्य की
रेखाएँ खींच देता है।
शक्ति में करुणा जब बसती है,
प्रगति में शांति
स्वयं उतर आती है।
तभी यह यात्रा
विकास से आगे
विश्व-मानवता तक पहुँचती है।
— A. K. Mehta
सोच बदलो – जीवन बदलो
मन में बीज सोच का बोओ,
जीवन का वृक्ष फल दिखाए।
छोटी सोच, छोटे कदम,
बड़ी सोच, बड़ी उड़ान बनाए।
अंधेरा चाहे घना हो,
सही सोच सब रोशन कर दे।
भीतर जागृति, बाहरी शक्ति,
महान सोच लाए भाग्य और सम्मान।
हर कदम सोच का प्रतिबिंब है,
मन बदलो—दुनिया बदल जाएगी।
सोच बदलो, जीवन बदल जाएगा,
राह खुद-ब-खुद आसान बन जाएगी।
— A. K. Mehta
All is Well
All is well.
Breathe in.
Breathe out.
Life flows,
like a calm river.
Every moment shines.
What happens is light.
Every experience opens a new path.
I trust my journey.
I am at peace.
I live fully in the present.
Release fear.
Let worries fade.
Mind light, soul uplifted.
What is mine will come.
At the right time, like the sun.
Steps move in the right direction.
I smile.
Everything is beautiful.
All is well.
— A. K. Mehta
चेतना का उदय
इतिहास तुम्हारा मार्गदर्शक है,
पर वह बोझ नहीं, केवल प्रेरणा है।
अपने भीतर की चेतना को पहचानो,
हर विचार को सचेत और सशक्त बनाओ।
अँधेरों से मत घबराओ,
प्रकाश हमेशा अंदर ही है।
हर क्षण एक नया अवसर है,
हर साँस जीवन को नया मोड़ देती है।
उदय हो रहा है चेतना का,
अब समय है जागने और बदलने का।
मन के बंद दरवाजे खोलो,
नई ऊर्जा और विश्वास को अंदर आने दो।
स्वयं पर भरोसा रखो,
अपने कर्मों को महान बनाओ।
हर छोटा प्रयास भी भविष्य बनाता है,
जागो और अपने प्रकाश से संसार को रोशन करो।
— A. K. Mehta
अब तुम्हारा समय है
जब उम्मीद कमजोर होने लगे,
जब विश्वास डगमगाने लगे,
तब भीतर से एक स्वर उठता है —
“उठो साहसी साक्षी, अब तुम्हारी बारी है।”
भीड़ के बीच एक दीप जलता है,
जो अंधेरों में भी राह दिखाता है।
न नाम की चाह, न यश का लोभ,
बस सेवा, प्रेम और अंतर-प्रकाश।
सेवा बने तेरी शक्ति,
ज्ञान बने तेरी ढाल,
साहस बने तेरी पहचान,
हर कदम पर जले मशाल।
अगर दिल में हल्की सी आवाज़ आए —
“हाँ… मैं कर सकता हूँ,”
तो समझ लो, यह पुकार तुम्हारे लिए है,
यह समय तुम्हारा है।
मत रुको, मत झुको, मत डरना,
अपने पथ से कभी मत हटना।
तेरी जागी हुई साक्षी चेतना की शक्ति,
हज़ार सोए मनों को जगा सकती।
जो अकेला जलना सीख ले,
वही पूरी दुनिया को रोशन कर दे।
रा धा/ध: स्व आ मी 🙏
— A K Mehta

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