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आत्मसम्मान की गरिमा: संतुलन और शालीनता

आत्मसम्मान की गरिमा: संतुलन और शालीनता आत्मसम्मान प्रत्येक मनुष्य का मूल अधिकार है और उसकी आंतरिक पहचान भी। यह हमें अपनी सीमाएँ पहचानना सिखाता है, साथ ही दूसरों के अस्तित्व का सम्मान करना भी। जब जीवन में कभी अपमान, असहमति या अनुचित व्यवहार का सामना होता है, तब आत्मसम्मान की सच्ची परीक्षा होती है—कि हम कैसी प्रतिक्रिया चुनते हैं। बदले की भावना प्रायः तत्काल राहत देती है, पर वह मन की शांति को भंग कर देती है। इसके विपरीत, संयम और शालीनता हमें वह संतुलन देते हैं, जिसमें बात भी पूरी तरह समझ में आती है और गरिमा भी बनी रहती है। आत्मसम्मान की रक्षा का अर्थ आक्रामक होना नहीं, बल्कि स्पष्ट और विनम्र होना है। शालीन भाषा और दृढ़ दृष्टिकोण का मेल ही सच्ची शक्ति है। जब हम सम्मानपूर्वक अपनी बात रखते हैं, तब हम न केवल स्वयं की मर्यादा की रक्षा करते हैं, बल्कि सामने वाले को भी सोचने का अवसर देते हैं। यह तरीका सार्वभौमिक है—हर संस्कृति, हर संबंध और हर परिस्थिति में स्वीकार्य। आत्मसम्मान मौन भी हो सकता है और संवाद भी। कभी-कभी शांत रहकर आगे बढ़ जाना ही सबसे स्पष्ट उत्तर होता है, और कभी सधे हुए शब्दों ...

THOUGHTS COLLECTION 2025

THOUGHTS:-   Thoughts — आनंद किशोर मेहता ना मुझे काना-फूसी भाती है, ना जी-हुजूरी रास आती है; मैं तो बस प्रेम का राही हूँ। झूठ के सहारे बड़ी-बड़ी बातें की जा सकती हैं, लेकिन मानवता की ऊँचाई केवल सच से ही हासिल होती है। मानवता कोई वेश नहीं, जिसे ज़रूरत के हिसाब से बदला जा सके — यह तो आत्मा की असली परछाई है। जहाँ स्वार्थ बोलते हैं, वहाँ वास्तविकता खामोश हो जाती है — क्योंकि वह दिखावे की मोहताज नहीं होती। जो अपने ही मन की भ्रमों और दुर्बलताओं पर विजय पा ले — वही सच्चा शूरवीर है। माँ-बाप वो साया हैं जो धूप में जलते हुए भी हमें ठंडक देते हैं — और हम छाँव में रहकर भी उनकी तपन को नज़रअंदाज़ कर जाते हैं। दुनिया चाहे झूठ बोले या भ्रम फैलाए — पर अंततः तुम्हारा कर्म ही तुम्हारी पहचान बनता है। कृतज्ञता वह चाबी है जो हमारे पास मौजूद चीज़ों को ही पर्याप्त बना देती है। जीवन एक यात्रा है — कुछ साथ चलते हैं, कुछ मोड़ पर विदा लेते हैं, पर जिनसे प्रेम था, वे कभी दूर नहीं जाते। असली संघर्ष सड़क पर नहीं, अंदर की चुप्पी में छिपा होता है। कुछ स्थितियाँ स्वीकारना ही शां...

निःस्वार्थता और समर्पण: सच्ची शांति की राह

निःस्वार्थता और समर्पण: सच्ची शांति की राह ~ आनंद किशोर मेहता जीवन केवल संयोग नहीं, बल्कि एक साधना है—जिसका लक्ष्य है आंतरिक शांति, स्थायी संतोष और व्यापक उद्देश्य में स्वयं को विलीन करना। यह यात्रा तब शुरू होती है जब मनुष्य अपने ‘स्व’ की सीमाओं को पहचानता है और अहंकार, वासनाओं व निजी आकांक्षाओं की दीवारें तोड़कर व्यापक चेतना से जुड़ता है। सेवा का सौंदर्य: जहाँ ‘मैं’ नहीं, केवल ‘तू’ होता है जब कोई व्यक्ति सेवा को जीवन का उद्देश्य बना लेता है, तब वह दुनिया की प्रतिक्रिया से स्वतंत्र हो जाता है। न प्रशंसा उसे लुभाती है, न आलोचना विचलित करती है। उसका कर्म निष्कलुष, निस्वार्थ और निर्मल हो जाता है। ऐसे व्यक्ति का अस्तित्व स्वयं ही सुकून और प्रेरणा फैलाता है। "जहाँ कर्म सेवा बन जाए, वहाँ जीवन परम सत्य से एकरूप हो जाता है।" समर्पण: जीवन को दिशा देने वाला मौन संगीत समर्पण हार नहीं, बल्कि स्वीकार की पराकाष्ठा है। यह वह क्षण है जब मनुष्य जान लेता है कि वह संपूर्ण व्यवस्था का एक विनम्र यंत्र है—ना स्वामी, ना संचालक, केवल एक विश्वासी। तब उसका प्रत्येक कार्य आभार, विश्वास और निष्ठा...

तू हारकर भी विजेता है

तू हारकर भी विजेता है  ~ आनंद किशोर मेहता जीवन में हार और जीत केवल बाहरी घटनाएँ नहीं हैं, बल्कि ये हमारी आंतरिक स्थिति को भी परिभाषित करती हैं। अक्सर लोग हार को अंत समझ लेते हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि हर हार अपने भीतर एक नई जीत की संभावना समेटे होती है। जब तक हम प्रयास करना नहीं छोड़ते, तब तक कोई भी हार अंतिम नहीं होती। "हार कोई अंत नहीं, यह तो बस एक नया आरंभ है!" वैज्ञानिक दृष्टिकोण थॉमस एडिसन का उदाहरण लें, जिन्होंने 1000 से अधिक बार असफल होने के बाद बल्ब का आविष्कार किया। जब उनसे पूछा गया कि इतनी बार विफल होने के बावजूद उन्होंने हार क्यों नहीं मानी, तो उन्होंने उत्तर दिया, "मैं असफल नहीं हुआ, मैंने 1000 ऐसे तरीके खोजे जो काम नहीं करते थे।" यही असली जीत है—असफलताओं से सीखकर आगे बढ़ना। "असली हार तब होती है जब हम प्रयास करना छोड़ देते हैं।" दार्शनिक दृष्टिकोण सुकरात, जिन्होंने तर्क और विचारशीलता से समाज को नई दिशा दी, उन्हें भी अपनी सत्यनिष्ठा के कारण विष का प्याला पीना पड़ा। उनकी मृत्यु को उनके विरोधियों ने जीत समझा, लेकिन उनके विच...