काम, जिम्मेदारी और आत्मसम्मान: जीवन से सीखा एक अनुभव जीवन के अनुभव हमें धीरे-धीरे यह सिखाते हैं कि काम केवल आजीविका का साधन नहीं होता, बल्कि हमारे व्यक्तित्व और मूल्यों का भी प्रतिबिंब होता है। मेरे अपने अनुभव में मुझे कभी किसी के अधीन काम करने से समस्या नहीं रही। हर संस्था और कार्यस्थल पर वरिष्ठों का मार्गदर्शन आवश्यक होता है। लेकिन एक बात हमेशा स्पष्ट रही है—चापलूसी या जी-हुजूरी मेरी प्रकृति का हिस्सा नहीं है। जब भी कोई वरिष्ठ मुझे कोई कार्य सौंपते हैं, मैं उसे केवल एक निर्देश के रूप में नहीं देखता। मैं उसे अपनी जिम्मेदारी मानकर पूरे उत्साह, ईमानदारी और समर्पण के साथ करने का प्रयास करता हूँ। मेरे लिए किसी भी काम का अर्थ केवल उसे पूरा करना नहीं, बल्कि उसे अपनी क्षमता के अनुसार बेहतर बनाना होता है। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि यही समर्पण कुछ लोगों को अलग तरीके से दिखाई देता है। ऐसे समय में मैंने अक्सर यह समझा है कि अनावश्यक विवाद या असहजता पैदा करने से बेहतर है कि परिस्थिति को शांतिपूर्वक स्वीकार किया जाए। समय ने मुझे यह सिखाया है कि काम केवल दायित्व नहीं, बल्कि एक अवसर भी है—ज...
Fatherhood of God & Brotherhood of Man.