“छह वर्षों की खामोशी के बाद…”
कभी-कभी किसी बच्चे की बुद्धि कमजोर नहीं होती,
बस उसका जागने का समय बाकी होता है।
वह बच्चा वर्षों तक किताबों के सामने बैठा रहा।
माता-पिता और शिक्षकों ने अनगिनत प्रयास किए,
पर परिणाम जैसे सूखी धरती पर बरसात का इंतज़ार हो…
फिर एक दिन अचानक कुछ बदला।
शायद आत्मविश्वास जागा,
शायद किसी बात ने भीतर की नींद तोड़ी,
या शायद समय ने आखिर उसका हाथ थाम लिया।
उस दिन शिक्षक ने पहली बार महसूस किया कि
बच्चा पढ़ नहीं रहा था —
वह अब समझने लगा है।
जो काम वर्षों की कोशिशों से नहीं हो पाया,
वह उसने एक दिन में कर दिखाया।
और फिर तो जैसे मौसम बदल गया…
हर दिन नया उत्साह,
हर दिन नई प्रगति,
और केवल तीन महीनों में
उसने वह कर दिखाया
जिसका इंतज़ार शिक्षक वर्षों से कर रहे थे।
यह कहानी सिर्फ एक बच्चे की नहीं,
बल्कि उस सत्य की है कि —
“हर फूल अपने समय पर खिलता है।
कुछ बच्चों को समझने में देर लगती है,
लेकिन जब वे जागते हैं,
तो इतिहास बदल देते हैं।”
— 𝓐 𝓚 𝓜𝓮𝓱𝓽𝓪 ✍️

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