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Sakshi Bhav Explained: The Secret of Becoming a Silent Observer of Life

साक्षी – जीवन का मौन दर्शक जीवन लगातार चल रहा है—कभी विचारों का शोर, कभी भावनाओं का तूफान, और कभी परिस्थितियों का दबाव। लेकिन इन सबके बीच एक ऐसी स्थिति भी है जहाँ मन शांत होकर केवल देखता है, बिना जुड़ाव और बिना प्रतिक्रिया के। इसी अवस्था को साक्षी भाव कहा जाता है। साक्षी वह है जो भीतर बैठकर हर अनुभव को केवल देखता है। वह न किसी विचार से भागता है और न ही किसी भावना में खोता है। वह बस जागरूक रहता है—स्थिर, शांत और मौन। जब हम अपने विचारों और भावनाओं को ही अपना “स्वरूप” मान लेते हैं, तब जीवन उलझ जाता है। लेकिन जब हम उन्हें केवल देखने लगते हैं, तब एक दूरी बनती है—और उसी दूरी में शांति जन्म लेती है। साक्षी भाव हमें सिखाता है कि हम केवल प्रतिक्रिया करने वाले नहीं हैं, बल्कि देखने वाले भी हैं। सुख आता है तो जाता है, दुख आता है तो चला जाता है—लेकिन जो सबको देख रहा है, वह स्थिर रहता है। धीरे-धीरे जब यह समझ गहरी होने लगती है, तब जीवन हल्का हो जाता है। चीजें बदलती नहीं, लेकिन उन्हें देखने का तरीका बदल जाता है। साक्षी बनना जीवन से दूर जाना नहीं, बल्कि जीवन को गहराई से समझना है। A K Mehta ...
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कविता From Struggle to Self-Mastery | Inspirational & Spiritual Hindi Poetry by A K Mehta

अब समय तुम्हारा है… जब भीतर कोई आवाज़ उठे— “अब समय तुम्हारा है,” तो कदमों को मत बाँधो तुम, बस आगे बढ़ते जाना है। राहें होंगी टेढ़ी-मेढ़ी, धूप भी सिर पर आएगी, पर चलते रहने वालों को ही मंज़िल गले लगाएगी। धीरे चलो तो भी क्या ग़म, बस रुकना तुम्हारा काम नहीं, थक जाओ तो ठहर जाना, पर हार मानना नाम नहीं। कभी गिरोगे, कभी सँभलोगे, यही सफर की कहानी है, जो हर हाल में आगे बढ़े, वही असली वीर निशानी है। तो जब भी दिल ये कहे तुमसे— “अब वक़्त बदलने वाला है,” तो डर को पीछे छोड़ के बस अपने रास्ते चलना है। — Anand Kishor Mehta अंतर्यामी का स्पर्श जब मन की तरंगें शांत हो जाती हैं, और विचार भी थककर ठहर जाते हैं, तब एक सूक्ष्म सी उपस्थिति अंतर में धीरे-धीरे प्रकट होती है। वो शब्दों से परे है, पर हर शब्द उसी से जन्म लेता है। वो रूप से परे है, पर हर रूप में वही बसता है। मेरी हर अनकही प्रार्थना उस तक बिना मार्ग के पहुँच जाती है, क्योंकि वो कहीं बाहर नहीं— मेरे ही अस्तित्व में विराजमान है। जब अहंकार मिटने लगता है, और “मैं” का बंधन ढलने लगता है, तब उसी के प्रकाश में सत्य का द्...

ब्लॉक प्रिंटिंग: सेवा से आत्मनिर्भरता और रोजगार की दिशा | Block Printing as Service & Opportunity

ब्लॉक प्रिंटिंग को मैंने सेवा के रूप में शुरू किया था। और आज भी यह मेरे लिए सेवा के रूप में ही चल रहा है। शुरुआत में यह सिर्फ एक छोटा सा प्रयास था, लेकिन धीरे-धीरे समझ आया कि इसमें सिर्फ कला नहीं, बल्कि एक बड़ा अवसर भी छिपा है। अगर इसे सही तरीके से आगे बढ़ाया जाए, तो यह छोटे स्तर से लेकर बड़े उद्योग तक का रूप ले सकता है और कई लोगों के लिए रोजगार का साधन बन सकता है। मेरे लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि इसमें घर में रहने वाली महिलाएँ भी आसानी से जुड़ सकती हैं। वे अपनी जिम्मेदारियों के साथ केवल 2–3 घंटे समय देकर एक सम्मानजनक आय कमा सकती हैं। मेरे लिए यह केवल एक काम नहीं है, बल्कि सेवा, रोजगार और आत्मनिर्भरता को जोड़ने का एक साधन है। अगर इसे सही दिशा और सहयोग मिले, तो यह समाज में कई लोगों के जीवन में सकारात्मक बदलाव ला सकता है।  I started block printing as a form of service, and even today I continue it with the same intention. It began as a small effort, but over time I realized that it is not just an art, but also a big opportunity. If developed in the right way, it can grow from a...

Parents Are Not Property, But Responsibility | Deep Social Thought by Anand Kishore Mehta

माता-पिता: जायदाद नहीं, ज़िम्मेदारी हैं | एक गहन सामाजिक विचार आज के भौतिकतावादी युग में रिश्तों को भी संपत्ति की तरह तौला जाने लगा है—मालिकाना हक, बंटवारा और लाभ के आधार पर। कभी जो माता-पिता हमारे संस्कारों और भावनाओं की नींव थे, उन्हें धीरे-धीरे विरासत का हिस्सा समझा जाने लगा है, जिम्मेदारी का नहीं। हम अक्सर देखते हैं कि परिवार जायदाद के लिए अदालतों तक पहुँच जाते हैं, लेकिन जब अपने वृद्ध माता-पिता की देखभाल की बात आती है, तो वही लोग पीछे हट जाते हैं। यह केवल कानूनी या आर्थिक समस्या नहीं है—यह समाज की भावनात्मक और नैतिक गिरावट का संकेत है। विरासत बांटी जा सकती है। लेकिन देखभाल, सम्मान, समय और प्रेम—इन्हें संपत्ति की तरह विभाजित नहीं किया जा सकता, इन्हें जीना पड़ता है। जब बच्चे अपने माता-पिता को अपने बुज़ुर्गों की सेवा करते देखते हैं, तो वे सीखते हैं कि जिम्मेदारी एक मूल्य है। लेकिन जब वे उपेक्षा देखते हैं, तो वे सीखते हैं कि बुज़ुर्ग बोझ हैं। इस सोच को बदलने की आवश्यकता है। माता-पिता कोई बोझ नहीं हैं। वे केवल सुविधा के अनुसार निभाई जाने वाली जिम्मेदारी नहीं हैं। वे हमारे जीवन की जड़ें...

जीवन में करुणा और सकारात्मक सोच | शांत मन और बेहतर समझ – A K Mehta

एक सरल और सकारात्मक सोच जिंदगी में हम बहुत सारे लोगों से मिलते हैं। हर इंसान अलग होता है — उसकी सोच, उसका अनुभव और उसकी परिस्थितियाँ भी अलग होती हैं। कई बार लोग हमारे हिसाब से नहीं सोचते या व्यवहार करते हैं। लेकिन धीरे-धीरे समझ आता है कि हर इंसान अपने अनुभव और स्थिति के अनुसार ही प्रतिक्रिया देता है। जब हम यह बात समझ लेते हैं, तो हमारे अंदर गुस्सा कम होने लगता है और समझ बढ़ने लगती है। और उसकी जगह एक सुंदर भावना आती है — करुणा और सकारात्मक सोच। करुणा का मतलब यह नहीं कि गलत बात को सही मान लिया जाए, बल्कि यह समझना है कि हर व्यक्ति अपनी परिस्थिति में जीवन को समझने की कोशिश कर रहा है। जब हम इस सोच को अपनाते हैं, तो मन हल्का होता है, तनाव कम होता है, और जीवन ज्यादा शांत और आसान लगने लगता है। शायद जीवन की सबसे अच्छी सीख यही है — हर स्थिति में शांत रहना, अच्छा सोचना, और सकारात्मक बने रहना। — A K Mehta