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पहचान से नहीं, चरित्र से होती है इंसान की असली पहचान | A K Mehta

आज की दुनिया में सबसे ज़्यादा महत्व किस चीज़ को दिया जाता है? कई लोग कहेंगे — पैसा। कुछ कहेंगे — सफलता। और कुछ — पहचान, नेटवर्क या सोशल मीडिया की लोकप्रियता। लेकिन धीरे-धीरे ऐसा लगता है कि हम एक ऐसी दुनिया बना रहे हैं जहाँ इंसान की कीमत उसके चरित्र से नहीं, बल्कि उसकी उपलब्धियों और दिखावे से तय होने लगी है। लोग यह जानने से पहले कि आप कैसे इंसान हैं, यह जानना चाहते हैं कि आप क्या करते हैं, कितना कमाते हैं, और कितने लोगों तक आपकी पहुँच है। फिर भी, जीवन बार-बार एक गहरी बात सिखाता है — पद हमेशा नहीं रहता। पैसा हमेशा नहीं रहता। लोकप्रियता भी समय के साथ बदल जाती है। लेकिन एक चीज़ है जो हर दौर में सम्मान दिलाती है — आपका व्यवहार, आपकी सच्चाई, और दूसरों के प्रति आपका दृष्टिकोण। क्योंकि अंत में लोग आपकी सफलता से प्रभावित हो सकते हैं, लेकिन आपके चरित्र से ही जुड़ते हैं। एक अच्छे इंसान की पहचान कभी पुरानी नहीं होती। विचार : आज की दुनिया में लोग आपकी बातों से पहले आपकी पहचान और हैसियत देखते हैं, लेकिन समय बीतने के बाद लोगों को आपका नाम नहीं, आपका व्यवहार, आपका स्वभाव और आपका चरि...
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गाँव में घटता विश्वास और बढ़ती दूरियाँ | A K Mehta

गाँव अब पहले जैसे सुरक्षित और अपने क्यों नहीं रहे? यह प्रश्न केवल किसी एक गाँव का नहीं, बल्कि बदलते समाज का आईना है। जहाँ कभी विश्वास और अपनापन था, वहाँ आज अविश्वास, गुटबाज़ी और दूरियाँ बढ़ती दिखाई दे रही हैं। कुछ नकारात्मक और आपराधिक प्रवृत्तियाँ पूरे वातावरण को प्रभावित कर रही हैं, और सबसे चिंताजनक बात यह है कि अच्छे लोग धीरे-धीेरे मौन होते जा रहे हैं। किसी भी समाज की वास्तविक ताकत उसकी इंसानियत, न्याय, संस्कार और आपसी सम्मान में होती है। जब यही मूल्य कमजोर पड़ने लगते हैं, तो विकास भी अधूरा और खोखला महसूस होने लगता है। हमें केवल बेहतर गाँव बनाने की नहीं, बल्कि बेहतर सोच, बेहतर चरित्र और बेहतर समाज बनाने की आवश्यकता है। “समाज तब नहीं हारता जब बुरे लोग बढ़ते हैं, समाज तब हारता है जब अच्छे लोग मौन हो जाते हैं।” और याद रखिए— “किसी पर उंगली उठाने से पहले स्वयं के विचार, व्यवहार और चरित्र को अवश्य देखिए। क्योंकि दूसरों की गलतियाँ गिनाने से पहले इंसान की अपनी पहचान भी सामने आ जाती है।” — A K Mehta

Sakshi Bhav Explained: The Secret of Becoming a Silent Observer of Life

साक्षी – जीवन का मौन दर्शक जीवन लगातार चल रहा है—कभी विचारों का शोर, कभी भावनाओं का तूफान, और कभी परिस्थितियों का दबाव। लेकिन इन सबके बीच एक ऐसी स्थिति भी है जहाँ मन शांत होकर केवल देखता है, बिना जुड़ाव और बिना प्रतिक्रिया के। इसी अवस्था को साक्षी भाव कहा जाता है। साक्षी वह है जो भीतर बैठकर हर अनुभव को केवल देखता है। वह न किसी विचार से भागता है और न ही किसी भावना में खोता है। वह बस जागरूक रहता है—स्थिर, शांत और मौन। जब हम अपने विचारों और भावनाओं को ही अपना “स्वरूप” मान लेते हैं, तब जीवन उलझ जाता है। लेकिन जब हम उन्हें केवल देखने लगते हैं, तब एक दूरी बनती है—और उसी दूरी में शांति जन्म लेती है। साक्षी भाव हमें सिखाता है कि हम केवल प्रतिक्रिया करने वाले नहीं हैं, बल्कि देखने वाले भी हैं। सुख आता है तो जाता है, दुख आता है तो चला जाता है—लेकिन जो सबको देख रहा है, वह स्थिर रहता है। धीरे-धीरे जब यह समझ गहरी होने लगती है, तब जीवन हल्का हो जाता है। चीजें बदलती नहीं, लेकिन उन्हें देखने का तरीका बदल जाता है। साक्षी बनना जीवन से दूर जाना नहीं, बल्कि जीवन को गहराई से समझना है। A K Mehta ...

कविता From Struggle to Self-Mastery | Inspirational & Spiritual Hindi Poetry by A K Mehta

अब समय तुम्हारा है… जब भीतर कोई आवाज़ उठे— “अब समय तुम्हारा है,” तो कदमों को मत बाँधो तुम, बस आगे बढ़ते जाना है। राहें होंगी टेढ़ी-मेढ़ी, धूप भी सिर पर आएगी, पर चलते रहने वालों को ही मंज़िल गले लगाएगी। धीरे चलो तो भी क्या ग़म, बस रुकना तुम्हारा काम नहीं, थक जाओ तो ठहर जाना, पर हार मानना नाम नहीं। कभी गिरोगे, कभी सँभलोगे, यही सफर की कहानी है, जो हर हाल में आगे बढ़े, वही असली वीर निशानी है। तो जब भी दिल ये कहे तुमसे— “अब वक़्त बदलने वाला है,” तो डर को पीछे छोड़ के बस अपने रास्ते चलना है। — Anand Kishor Mehta अंतर्यामी का स्पर्श जब मन की तरंगें शांत हो जाती हैं, और विचार भी थककर ठहर जाते हैं, तब एक सूक्ष्म सी उपस्थिति अंतर में धीरे-धीरे प्रकट होती है। वो शब्दों से परे है, पर हर शब्द उसी से जन्म लेता है। वो रूप से परे है, पर हर रूप में वही बसता है। मेरी हर अनकही प्रार्थना उस तक बिना मार्ग के पहुँच जाती है, क्योंकि वो कहीं बाहर नहीं— मेरे ही अस्तित्व में विराजमान है। जब अहंकार मिटने लगता है, और “मैं” का बंधन ढलने लगता है, तब उसी के प्रकाश में सत्य का द्...

ब्लॉक प्रिंटिंग: सेवा से आत्मनिर्भरता और रोजगार की दिशा | Block Printing as Service & Opportunity

ब्लॉक प्रिंटिंग को मैंने सेवा के रूप में शुरू किया था। और आज भी यह मेरे लिए सेवा के रूप में ही चल रहा है। शुरुआत में यह सिर्फ एक छोटा सा प्रयास था, लेकिन धीरे-धीरे समझ आया कि इसमें सिर्फ कला नहीं, बल्कि एक बड़ा अवसर भी छिपा है। अगर इसे सही तरीके से आगे बढ़ाया जाए, तो यह छोटे स्तर से लेकर बड़े उद्योग तक का रूप ले सकता है और कई लोगों के लिए रोजगार का साधन बन सकता है। मेरे लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि इसमें घर में रहने वाली महिलाएँ भी आसानी से जुड़ सकती हैं। वे अपनी जिम्मेदारियों के साथ केवल 2–3 घंटे समय देकर एक सम्मानजनक आय कमा सकती हैं। मेरे लिए यह केवल एक काम नहीं है, बल्कि सेवा, रोजगार और आत्मनिर्भरता को जोड़ने का एक साधन है। अगर इसे सही दिशा और सहयोग मिले, तो यह समाज में कई लोगों के जीवन में सकारात्मक बदलाव ला सकता है।  I started block printing as a form of service, and even today I continue it with the same intention. It began as a small effort, but over time I realized that it is not just an art, but also a big opportunity. If developed in the right way, it can grow from a...