मैं हूँ न — अनंत कृपा दयालबाग के पावन मार्च-पास्ट में, भक्त श्रद्धा और मौन लिए खड़े। मालिक स्वयं प्रकट होते हैं, हर हृदय में प्रेम और उजास भरने को। एक झलक में मिट जाएँ सारे दुख, हर वेदना शांति में विलीन। उस क्षण केवल मालिक ही रहते हैं, बाकी सब शून्य में खो जाए। ई-व्हीकल में बैठे भी ध्यान मग्न, दया और मेहर की असीम वर्षा। हर सूर्त की सूक्ष्म पुकार सुनकर, प्रेम की दिव्य ज्योति जलाते हैं। “मैं हूँ न” — केवल शब्द नहीं, पिता की शाश्वत दया और प्रेम। टूटे मन को जोड़ने वाली, अनंत, पवित्र, दिव्य लहर। खेत सेवा में थककर भी भक्त, समर्पण में झुककर लीन। दया की शीतल वर्षा बनकर, मालिक दर्शन का अवसर देते हैं। निर्मल चेतन देश की सुवासित छाया से, जीवन पावन होकर महक उठते हैं। भटकी सुरती को उसके मूल स्वरूप से, फिर से मिलाने मालिक आते हैं। — A. K. Mehta कर्म का प्रतिबिंब जब मन किसी को दुख देने से विराम ले लेता है, तब भीतर मौन जन्म लेता है। और यदि कोई उस मौन को तोड़ने आए, तो पीड़ा शोर नहीं बनती— वह साक्षी-भाव बन जाती है। दुख देने वाला अपने ही कर्मों की छाया में उलझ जाता है, ...
जीवन की शांत गूंज हर सुबह बिना शोर के आती है, हथेलियों में उम्मीद की कोमल रोशनी लिए। जो देख सके, वही समझ पाए— नया दिन स्वयं एक मौन संदेश है। मौन की गहराई में ही शक्ति का निवास होता है। जहाँ शब्द थक जाते हैं, वहीं आत्मा बोल उठती है। जो शांत रहकर स्वयं को थाम ले, वह तूफ़ानों में भी अपनी दिशा खोज लेता है। समय हमें बदलने नहीं, स्वयं को समझने का अवसर देता है। हर क्षण धीरे से पूछता है— क्या तुम आज कल से बेहतर हो? कम शब्द, गहरे अर्थ— यही जीवन की सच्ची भाषा है। जो एक बार स्वयं को जीत ले, उसके भीतर हार कभी ठहर नहीं पाती। और जब लगे कि सब समाप्त हो गया है, तो ठहरकर सुनना— क्योंकि हर अंत के भीतर एक नई शुरुआत शांत गूंज बनकर जन्म लेती है। — Anand Kishor Mehta जागता व्यक्तित्व अँधेरों से मत डरना, हर दिल में उजाला है। सत्य और धैर्य की राह पकड़ो, स्वयं की रोशनी जगाओ। हर कदम, हर अनुभव, तेरा दीपक और प्रखर करे। अपने व्यक्तित्व को चमकने दो, दुनिया को भी दिशा दिखाए। — आनंद किशोर मेहता सपनों के पार सुख-दुख की दुनिया से परे, जहाँ मन का शोर न पहुँचे, वहाँ उठते हैं शांत विचार, जैसे ...