गांव की गलियाँ और उनके किस्से – राजाबरारी की झलक आज मैं राजाबरारी गांव गया और वहां के स्थानीय लोगों के साथ समय बिताया। थोड़ी देर रुककर उनकी संस्कृति, परंपराएँ और रोजमर्रा की जिंदगी को करीब से समझा। गांव की गलियाँ शांत और सादगी भरी थीं, हर मोड़ पर मिट्टी की खुशबू और अपनापन महसूस हुआ। स्थानीय लोगों की बातें, उनकी हँसी और अनुभव यह याद दिलाते हैं कि असली सीख अक्सर किताबों से नहीं, बल्कि जीवन और लोगों से मिलती है। राजाबरारी की खूबसूरती सिर्फ परंपराओं में नहीं, बल्कि छोटे-छोटे अनुभवों और अपनापन में झलकती है। यह अनुभव आंखों और दिल दोनों को ताजगी देता है। आनंद किशोर मेहता
गाँव की सुबह, मन की मुस्कान आज सुबह गाँव वैसा ही था, जैसा हर दिन होता है। फिर भी पता नहीं क्यों मन कुछ ज़्यादा ही शांत था। आसमान हल्का-सा सुनहरा हो रहा था। सूरज धीरे-धीरे ऊपर आ रहा था, जैसे उसे भी कोई जल्दी न हो। पगडंडी पर चलते हुए मैंने महसूस किया — यह रास्ता कहीं बाहर नहीं, अंदर तक जाता है। ओस से भीगी घास पर जब कदम पड़े, तो लगा जैसे धरती ने चुपचाप स्वागत किया हो। दूर से आती बच्चों की हँसी हवा में घुल रही थी। उनकी मुस्कान में कोई चिंता नहीं थी, कोई तुलना नहीं थी। लोग अपने काम में लगे थे, बिना शोर, बिना दिखावे। हर चेहरा साधारण था, पर संतुष्ट। तभी समझ आया — खुशी बड़ी घटनाओं में नहीं, इन छोटे पलों में छिपी रहती है। गाँव कुछ कहता नहीं, पर बहुत कुछ जगा देता है। यह सिखाता नहीं, पर सोच बदल देता है। जब लौटकर घर आया, तो सब पहले जैसा ही था — बस मन अलग था। हल्का… स्पष्ट… और मुस्कुराता हुआ। शायद यही गाँव की सुबह का असर है — जो बिना बोले भीतर एक नई रोशनी जगा देती है। — Anand Kishor Mehta 🌿