चार दिन गायब होकर देख लीजिए —
दुनिया वैसी ही चलती रहती है।
हम अक्सर यह मान लेते हैं कि हम दूसरों के जीवन में बहुत महत्वपूर्ण हैं।
हमें लगता है कि हमारे बिना बहुत कुछ रुक जाएगा।
लेकिन सच्चाई थोड़ी अलग होती है।
इस दुनिया में हर व्यक्ति की अहमियत उसकी जरूरत के अनुसार होती है।
जब तक हमारी उपस्थिति उपयोगी है, तब तक हमें महत्व मिलता है।
जैसे ही परिस्थितियाँ बदलती हैं, प्राथमिकताएँ भी बदल जाती हैं।
समय का स्वभाव भी यही है — वह किसी के लिए नहीं रुकता।
न रुकी वक़्त की गर्दिश, न ज़माना बदला,
पेड़ सूखा तो परिंदों ने ठिकाना बदला।
इस सच्चाई को समझना निराश होने के लिए नहीं, बल्कि जागरूक होने के लिए है।
इसलिए अपनी अहमियत दूसरों की ज़रूरतों से नहीं, बल्कि अपने कर्म, अपने चरित्र और अपनी सोच से बनाइए।
यही जीवन को सच में अर्थपूर्ण बनाता है।
— A. K. Mehta

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