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मिट्टी की खुशबू वाला मेरा गाँव – भेदजी, पचास वर्ष पहले की यादें

मिट्टी की खुशबू वाला मेरा गाँव – भेदजी, पचास वर्ष पहले की यादें





लगभग पचास वर्ष पहले, मेरा गाँव भेदजी सरल, प्राकृतिक और मिलनसार जीवन से भरा हुआ था। उस समय लोगों का रहन-सहन, खान-पान और जीवनशैली पूरी तरह प्रकृति के करीब थी। घर, बर्तन, खाना बनाने के तरीके—सब कुछ सादगी और आत्मनिर्भरता पर आधारित था।

गाँव के अधिकतर घर मिट्टी के बने होते थे और उनकी छत खपरैल या फूस की होती थी। घर के सामने खुला आँगन होता था, जहाँ पेड़-पौधे लगे रहते थे और अक्सर वही जगह हमारे मवेशियों के लिए भी होती थी। सुबह होते ही गाँव में हलचल शुरू हो जाती थी—कहीं चूल्हे जलते, कहीं लोग खेतों की ओर निकल जाते और कहीं पशुओं की आवाज़ों से पूरा माहौल जीवंत हो उठता था।

हमारे घर में भी मिट्टी का चूल्हा था। उसी चूल्हे पर लकड़ी और गोबर के उपलों की धीमी आग से खाना बनता था। चावल, दाल और सब्ज़ियाँ अक्सर मिट्टी की हांडी में पकती थीं। धीरे-धीरे पकने के कारण भोजन में मिट्टी की हल्की खुशबू आती थी, जो स्वाद को और भी बढ़ा देती थी। रोटी भी मिट्टी के तवे पर पकती थी, और जब वह धीरे-धीरे सिकती थी, तो उसकी खुशबू पूरे घर में फैल जाती थी। चूल्हे की आग पर बनी रोटी का स्वाद आज भी मेरे मन में ताज़ा है।

लगभग हर घर में मवेशी होते थे। बैल खेतों की जुताई करते और गाय, भैंस, बकरियाँ घर के लिए दूध देती थीं। वे केवल खेती या दूध का साधन नहीं थे, बल्कि परिवार का हिस्सा माने जाते थे। उस समय घी भी घर पर ही बनाया जाता था। गाय या भैंस के दूध से मलाई जमा की जाती और उसे मथकर शुद्ध घी निकाला जाता। इसलिए भोजन में प्राकृतिक स्वाद और शुद्धता होती थी। आज भी कुछ घरों में वही परंपरा जारी है।

जब धान और गेहूँ की कटनी और पीटने का समय आता था, तो हमारे घरों में लगभग 16-17 मजदूर बाहर से आकर रहते थे, और पूरा काम 15-20 दिनों में पूरा कर अपने घर चले जाते थे। पूरे वर्ष में घर पर केवल दो मजदूर और एक नौकर रहते थे, जो परिवार के सदस्य की तरह रहते। उन सभी का खाना घर पर ही पकता था। खाना बनाना घर की महिलाएं—दादी, चाची, माता, फुआ आदि—सभी मिलकर करती थीं। मक्खन और घी निकालने का काम दादी जी संभालती थीं, लेकिन सभी मिलकर मेहनत करते थे। घर में दादा-दादी, चाचा-चाची, माता-पिता और उनके सभी बच्चे साथ रहते और पढ़ाई करते थे।

हमारे घर पर पहले एक प्राइमरी स्कूल के शिक्षक पनाह लेते थे। उन्हें भी खाना और रहना घर पर मिलता था, और बदले में वे हमें सुबह और शाम पढ़ाते थे। गाँव का सामाजिक जीवन भी बहुत मजबूत था। जब गाँव में कोई झगड़ा, लड़ाई या अपराध होता था, तो उसका समाधान गाँव के बुजुर्गों या पाँचों प्रतिनिधियों के बीच ही होता था। उनके द्वारा दी गई सजा और निर्णय सभी लोगों के लिए मान्य होती थी, और यही व्यवस्था गाँव में शांति और आपसी विश्वास बनाए रखती थी।

गाँव का जीवन आपसी सहयोग, सादगी और परिवार के मिलजुल कर रहने से भरा हुआ था। आज समय बदल गया है, लेकिन मिट्टी के चूल्हे की आग, मिट्टी के बर्तनों में पकता भोजन, आँगन में बंधे मवेशी, घर का बना शुद्ध घी और गाँव की सहज सामाजिक व्यवस्था—इन सबकी यादें आज भी मुझे मेरे बचपन और भेदजी की उस पुरानी जीवनशैली की ओर ले जाती हैं।

सच कहूँ तो वह समय सादगी, आत्मनिर्भरता, सहयोग और प्रकृति के साथ जुड़ी जीवनशैली का सबसे सुंदर उदाहरण था। 🌾

वह पुराना घर, जिसमें मेरे दादा-दादी और मेरा बचपन गुज़रा। 






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