सीखने का मेरा दृष्टिकोण
मेरे विचार से सीखना केवल नई चीज़ करने की कोशिश तक सीमित नहीं है।
वास्तविक सीख तब विकसित होती है जब जिज्ञासा, अनुभव और स्वतंत्र सोच को जगह मिलती है।
जब किसी विद्यार्थी को प्रश्न पूछने, खोज करने और अपने तरीके से समझने की आज़ादी मिलती है, तब सीखना स्वाभाविक और गहरा बन जाता है। उस समय शिक्षा केवल जानकारी याद रखने की प्रक्रिया नहीं रहती, बल्कि समझ और अनुभव का विकास बन जाती है।
इस संदर्भ में खेल सीखने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। खेल में बच्चा केवल जीतने के लिए नहीं खेलता, बल्कि वह समझने, आज़माने और अनुभव करने के लिए खेलता है। इस प्रक्रिया में वह कई बार गलती करता है, फिर सीखता है और आगे बढ़ता है।
यही अनुभव धीरे-धीरे उसके आत्मविश्वास, रचनात्मकता और सोचने की क्षमता को मजबूत करते हैं।
मेरे अनुसार शिक्षा का उद्देश्य केवल सही उत्तर देना नहीं होना चाहिए।
शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य होना चाहिए कि वह सोचने, प्रश्न करने और समझ विकसित करने की क्षमता को मजबूत करे।
जब सीखने का वातावरण सहज, खुला और प्रोत्साहित करने वाला होता है, तब बच्चे बिना डर के आगे बढ़ते हैं। वे गलती से नहीं डरते, बल्कि हर अनुभव को सीखने का अवसर मानते हैं।
अंततः शिक्षा का सबसे बड़ा उद्देश्य यही है कि वह व्यक्ति को जिज्ञासु, आत्मनिर्भर और संवेदनशील बनाए।
ऐसी शिक्षा ही एक जागरूक और जिम्मेदार समाज के निर्माण की आधारशिला बन सकती है।
A K MEHTA


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