खामोशी के पीछे की सच्चाई कभी-कभी इंसान थोड़ा थक सा जाता है। जीवन की जिम्मेदारियाँ, अनुभव और समय की भागदौड़ उसे पहले की तरह खुलकर बोलने नहीं देतीं। तब वह धीरे-धीरे कम बोलने लगता है। बाहर से देखने पर लगता है जैसे वह दूर हो गया हो, लेकिन सच अक्सर इससे अलग होता है। कम बोलना या चुप रहना यह नहीं बताता कि किसी ने रिश्ते निभाना छोड़ दिया है। दिल के भीतर आज भी वही अपनापन रहता है, वही यादें और वही परवाह भी। बस अब हर भावना को शब्दों में कहने की आदत थोड़ी कम हो जाती है। याद तो सबकी आज भी आती है, चिंता भी सबकी होती है। फर्क सिर्फ इतना है कि पहले जो बातें कह दी जाती थीं, अब वे मन में ही रह जाती हैं। कब याद किया, कितना याद किया — यह बताने की जरूरत अब कम महसूस होती है। समय के साथ इंसान यह समझने लगता है कि हर भावना को जताना जरूरी नहीं होता। कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं जिनकी गहराई शब्दों से नहीं, बल्कि खामोशी से भी महसूस की जा सकती है। A K Mehta
Fatherhood of God & Brotherhood of Man.