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कविता-श्रृंखला : जीवन की शांत गूंज

जीवन की शांत गूंज  हर सुबह बिना शोर के आती है, हथेलियों में उम्मीद की कोमल रोशनी लिए। जो देख सके, वही समझ पाए— नया दिन स्वयं एक मौन संदेश है। मौन की गहराई में ही शक्ति का निवास होता है। जहाँ शब्द थक जाते हैं, वहीं आत्मा बोल उठती है। जो शांत रहकर स्वयं को थाम ले, वह तूफ़ानों में भी अपनी दिशा खोज लेता है। समय हमें बदलने नहीं, स्वयं को समझने का अवसर देता है। हर क्षण धीरे से पूछता है— क्या तुम आज कल से बेहतर हो? कम शब्द, गहरे अर्थ— यही जीवन की सच्ची भाषा है। जो एक बार स्वयं को जीत ले, उसके भीतर हार कभी ठहर नहीं पाती। और जब लगे कि सब समाप्त हो गया है, तो ठहरकर सुनना— क्योंकि हर अंत के भीतर एक नई शुरुआत शांत गूंज बनकर जन्म लेती है। — Anand Kishor Mehta नम्रता का शिखर — प्रेम का ध्वज  मैं इतना झुका, इतना सरल, इतना विनम्र हुआ कि संसार की चंचल दृष्टि भी एक पल को ठहर गई। यदि अब भी कोई और झुकाने की चाह रखता हो— तो बस एक मौन संकेत देना; शायद मैं पथ से डगमगा गया हूँ, ताकि अपनी ही अंतर-रोशनी में फिर से सही दिशा पहचान सकूँ। और जब नम्रता की हर कसौटी पूर्ण हो जाए, तो आओ—स...

Silent Seva, Infinite Blessings

Silent Seva, Infinite Blessings  मैंने जीवन भर निःस्वार्थ भाव से सेवा की — परिवार के लिए, समाज के लिए। मेरा हर कर्म शुद्ध और स्वार्थ-मुक्त था। फिर भी, इसे अक्सर नज़रअंदाज़ किया गया, तुच्छ समझा गया, और कभी-कभी अपमान भी सहना पड़ा। फिर भी, मैं नहीं रुका। मेरा भरोसा लोगों पर नहीं, बल्कि उस पर था जो हर भावना को जानता है — ईश्वर पर। उसकी कृपा से सेवा के द्वार धीरे-धीरे खुलते गए। अपमान और तिरस्कार ही मेरी असली परीक्षा बने। आज मेरे भीतर अनुभव, आत्मविश्वास और करुणा का एक असीम भंडार है — ऐसा खजाना जिसे कोई छीन नहीं सकता। अब मेरी ऊर्जा उन्हीं स्थानों पर जाती है, जहां सेवा को प्रेम और श्रद्धा से स्वीकार किया जाता है। निःस्वार्थ सेवा का सार: ईश्वर की दृष्टि में यह सर्वोच्च है। समाज इसे कभी-कभी तुच्छ समझे, लेकिन यह हमारी परीक्षा बनती है। अपमान और तिरस्कार से छिपा है हमारा असली आत्मबल। जब सेवा स्वार्थ-मुक्त होती है, हर कठिनाई सीख बन जाती है। सच्ची सेवा हमें असीम आंतरिक शांति और खुशी देती है। "जिस दिन तुम्हारे भीतर परमार्थ की अग्नि स्वार्थ को जला देगी, उसी दिन ईश्वर की करुणा तुम्हारी ओर श...

नम्रता का शिखर — प्रेम का ध्वज | प्रेरणादायक कविता

नम्रता का शिखर — प्रेम का ध्वज | प्रेरणादायक कविता 🌼   नम्रता का शिखर — प्रेम का ध्वज  🌼 मैं इतना झुका, इतना सरल, इतना विनम्र बना कि दुनिया की हैरानी भी क्षणभर को ठहर गई। अगर इससे भी नीचे झुकाने की किसी को चाहत हो— तो बस एक संकेत दे देना; शायद मैं राह से भटक गया हूँ, ताकि अपनी ही रोशनी में लौटकर सही मार्ग फिर पहचान सकूँ। और जब नम्रता की हर कसौटी पूरी हो चली, तो आओ—अब सब मिलकर रा धा/ध: स्व आ मी 🙏 दयाल के पावन संदेश को प्रेम, शांति और मालिक की दया–मेहर की अनंत अनुकंपा के साथ पूरे विश्व में गूँजाएँ। उन्नत कर दें वह ध्वज, जो करुणा का प्रतीक है— और उसे ऐसा गगनचुंबी बना दें कि वह केवल पृथ्वी पर नहीं, सारे ब्रह्मांड में झूम-झूम कर लहराए। ✍️ Anand Kishor Mehta Bhadeji Centre, Gaya (Bihar) नीरज भाई साहब, आपकी कल की गहन और प्रेरक बातचीत से प्रभावित होकर मैंने एक कविता रची और इसे यहां गूगल ब्लॉगर पर साझा किया। यह कविता मानव सोच की विशालता और अंतर्मन की गहराई को उजागर करती है। हार्दिक रा धा/ध स्व आ मी 🙏

राजाबरारी आदिवासी विद्यालय: शिक्षा, सेवा और स्वावलंबन का आदर्श मॉडल

राजाबरारी आदिवासी विद्यालय: शिक्षा, सेवा और स्वावलंबन का आदर्श मॉडल    ~ आनंद किशोर मेहता प्रस्तावना भारत जैसे विशाल देश में जहाँ शिक्षा का अधिकार संविधान द्वारा सुनिश्चित किया गया है, वहीं कुछ क्षेत्र आज भी इस अधिकार से वंचित हैं। विशेष रूप से आदिवासी समुदायों में अशिक्षा, गरीबी और सामाजिक उपेक्षा ने वर्षों से विकास के रास्ते को रोके रखा है। ऐसे में यदि कोई विद्यालय न केवल शिक्षा का दीपक जलाता है, बल्कि सेवा, आत्मनिर्भरता और समग्र विकास का मार्ग भी प्रशस्त करता है, तो वह केवल स्कूल नहीं, एक क्रांति का केंद्र बन जाता है। "राजाबरारी आदिवासी विद्यालय" , मध्य प्रदेश के हरदा जिले के सघन वन क्षेत्र में स्थित, एक ऐसा ही आदर्श उदाहरण है, जिसे दयालबाग शिक्षा संस्थान (Dayalbagh Educational Institute, Agra) की प्रेरणा, मार्गदर्शन और सेवा भावना के अंतर्गत संचालित किया जा रहा है। स्थापना की पृष्ठभूमि इस विद्यालय की शुरुआत 1936–37 में एक प्राथमिक विद्यालय के रूप में हुई थी। उस समय राजाबरारी एक घना वन क्षेत्र था, जहाँ आधुनिक सुविधाओं और शिक्षण संसाधनों की कल्पना भी नहीं की जा...

स्वाभिमान (Self-Respect)— आंतरिक शक्ति का मूल स्तंभ —

स्वाभिमान (Self-Respect)  — आंतरिक शक्ति का मूल स्तंभ — स्वाभिमान का अर्थ स्वाभिमान वह गहरी आत्म-मान्यता और गरिमा की भावना है, जो तब जन्म लेती है जब हम अपने मूल्यों, विश्वासों और ईमानदारी के अनुसार जीवन जीते हैं। यह दूसरों की प्रशंसा पर निर्भर नहीं करता, बल्कि इस पर आधारित होता है कि हम स्वयं को कैसे देखते और कैसे समझते हैं। स्वाभिमान के प्रमुख तत्व 1. आत्म-स्वीकृति • अपनी शक्तियों और कमजोरियों को बिना कठोर आलोचना के स्वीकार करना। • अपने अस्तित्व और बीते निर्णयों से संतुष्ट रहना। 2. व्यक्तिगत सीमाएँ (Boundaries) • जहाँ आवश्यक हो “न” कह पाने का साहस। • मानसिक, भावनात्मक और शारीरिक सीमाओं की रक्षा करना। 3. गरिमामय आचरण • ईमानदारी और न्याय के साथ कार्य करना — चाहे कोई देखे या न देखे। • अपने अंतरात्मा के अनुरूप निर्णय लेना। 4. आत्म-संतुष्टि • दूसरों की प्रशंसा या मान्यता पर निर्भर न रहना। • अपनी अंतरात्मा और विवेक पर विश्वास रखना। 5. आलोचना का संतुलित सामना • बिना टूटे सुनना और समझना। • सीख लेना — परंतु आत्म-मूल्य को न खोना। स्वाभिमान क्यों महत्वपूर्ण है? • ...

कविता श्रृंखला: अनकहे एहसास: दिल की बात

कविता श्रृंखला:  अनकहे एहसास: दिल की बात  अनकहे एहसास: दिल की बात ~ आनंद किशोर मेहता मैं दिया हूँ मैं दिया हूँ… मुझे बस अंधेरे से शिकायत है, हवा से नहीं। वो तो बस चलती है— कभी मेरे खिलाफ, कभी मेरे साथ। मैं चुप हूँ, पर बुझा नहीं, क्योंकि मेरा काम जलना है। ताकि किसी राह में भटके हुए को रौशनी मिल सके। मुझे दिखावा नहीं आता, ना ही शोर मचाना। मैं जलता हूँ भीतर से— सच, प्रेम और सब्र के संग। हवा सोचती है, कि वो मुझे गिरा सकती है। पर उसे क्या पता— मैं हर बार राख से भी फिर से जल उठता हूँ। मैं दिया हूँ… नम्र हूँ, शांत हूँ, मगर कमजोर नहीं। मैं अंधेरे का दुश्मन हूँ, इसलिए उजाले का दोस्त बना हूँ। तू चाहे जितनी बार आज़मा ले, मैं फिर भी वही रहूँगा— धीरे-धीरे जलता, पर हर दिल को छूता। "दीया कभी अंधेरे से डरता नहीं, वो तो उसी के बीच खुद को साबित करता है।" ─ आनंद किशोर मेहता जो कुछ नहीं कहता जो चुपचाप सब सह जाता है, कुछ कहे बिना मुस्कुराता है। वो रूह बड़ी प्यारी होती है, जो सबसे पहले औरों को चाहती है। ना शिकवा करता, ना शिकायत, बस दिल में रखता है हर बात। आँखो...

कविता- मैं कुछ भी नहीं… फिर भी कुछ कहना चाहता हूँ

मैं कुछ भी नहीं… फिर भी कुछ कहना चाहता हूँ । ~ आनंद किशोर मेहता मैं कुछ भी नहीं… फिर भी कुछ कहना चाहता हूँ ~ आनंद किशोर मेहता 1. मैं कोई ध्वनि नहीं, सिर्फ एक कंपन हूँ… जो हृदय की गहराई में कभी आह बनकर उतरता है, तो कभी प्रार्थना बनकर बहता है। मैं कोई सूरज नहीं, सिर्फ दीये की लौ हूँ, जो जलती है दूसरों के लिए और खुद की बात कभी नहीं करती। मैं कोई उपदेशक नहीं, बस एक पथिक हूँ… जिसने चलकर जाना कि रास्ता बताने से बेहतर है — चुपचाप चलना। मैंने कभी किसी से नहीं कहा — "मेरी सुनो…" पर शायद मेरी चुप्पी भी कभी-कभी आग्रह बन गई। मैंने कभी सेवा की उम्मीद में कुछ नहीं किया, फिर भी मन में कहीं छिपा रहा — कि शायद कोई देखे, कोई समझे… पर आज जानता हूँ — जो देता है, वह मैं नहीं — मैं तो बस उसी की एक प्रार्थनामयी अंश हूँ… अब मैं बस मौन से सीखता हूँ, और विनम्रता से जीता हूँ, क्योंकि जो झुक जाए — वही सबसे ऊँचा हो जाता है। मैं कोई सत्य नहीं हूँ, सिर्फ उसकी खोज में हर दिन गलता हुआ प्रश्न हूँ… और यदि कभी मेरी कोई बात तुम्हें बाँधती लगे — तो उसे मेरा कहना न समझो, ...

अपनी नई कहानी स्वयं लिखो

अपनी नई कहानी स्वयं लिखो ~ आनंद किशोर मेहता प्रिय विद्यार्थियों, जीवन एक सुंदर यात्रा है। हर दिन हमें सीखने, आगे बढ़ने और अपने सपनों के करीब जाने का अवसर देता है। यह ज़रूरी नहीं कि रास्ता हमेशा आसान हो, लेकिन यह निश्चित है कि हर कठिनाई हमें पहले से अधिक मज़बूत बनाती है। उठो, जागो और आगे बढ़ो “बेटा, उठो और जागो—सवेरा हो गया है। हिम्मत मत हारो, एक दिन तुम्हारी मेहनत रंग लाएगी।” ये शब्द हमें याद दिलाते हैं कि निराशा के अंधेरे के बाद सफलता का उजाला अवश्य आता है। आज की मेहनत ही कल की सफलता की नींव होती है। संघर्ष से ही शक्ति मिलती है संघर्ष जीवन का अनिवार्य हिस्सा है। जब हम गिरते हैं, तब हमें संभलना आता है। जब हम हारते हैं, तब हमें सीख मिलती है। और जब हम डटे रहते हैं, तभी हम जीतते हैं। विचार: “संघर्ष हमें परिष्कृत करता है और हमारी वास्तविक क्षमता को उजागर करता है।” आत्मविश्वास – सफलता की कुंजी अपने आप पर विश्वास रखो। यदि तुम स्वयं पर भरोसा करोगे, तो कोई भी बाधा तुम्हें रोक नहीं सकती। आत्मविश्वास से भरा मन हर समस्या का समाधान ढूँढ लेता है। विचार: “आत्मविश्वास का हर क...

तू हारकर भी विजेता है

तू हारकर भी विजेता है  ~ आनंद किशोर मेहता जीवन में हार और जीत केवल बाहरी घटनाएँ नहीं हैं, बल्कि ये हमारी आंतरिक स्थिति को भी परिभाषित करती हैं। अक्सर लोग हार को अंत समझ लेते हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि हर हार अपने भीतर एक नई जीत की संभावना समेटे होती है। जब तक हम प्रयास करना नहीं छोड़ते, तब तक कोई भी हार अंतिम नहीं होती। "हार कोई अंत नहीं, यह तो बस एक नया आरंभ है!" वैज्ञानिक दृष्टिकोण थॉमस एडिसन का उदाहरण लें, जिन्होंने 1000 से अधिक बार असफल होने के बाद बल्ब का आविष्कार किया। जब उनसे पूछा गया कि इतनी बार विफल होने के बावजूद उन्होंने हार क्यों नहीं मानी, तो उन्होंने उत्तर दिया, "मैं असफल नहीं हुआ, मैंने 1000 ऐसे तरीके खोजे जो काम नहीं करते थे।" यही असली जीत है—असफलताओं से सीखकर आगे बढ़ना। "असली हार तब होती है जब हम प्रयास करना छोड़ देते हैं।" दार्शनिक दृष्टिकोण सुकरात, जिन्होंने तर्क और विचारशीलता से समाज को नई दिशा दी, उन्हें भी अपनी सत्यनिष्ठा के कारण विष का प्याला पीना पड़ा। उनकी मृत्यु को उनके विरोधियों ने जीत समझा, लेकिन उनके विच...