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कविता श्रृंखला: अनकहे एहसास: दिल की बात

कविता श्रृंखला: अनकहे एहसास: दिल की बात 




अनकहे एहसास: दिल की बात

~ आनंद किशोर मेहता


मैं दिया हूँ

मैं दिया हूँ…
मुझे बस अंधेरे से शिकायत है,
हवा से नहीं।
वो तो बस चलती है—
कभी मेरे खिलाफ, कभी मेरे साथ।

मैं चुप हूँ, पर बुझा नहीं,
क्योंकि मेरा काम जलना है।
ताकि किसी राह में
भटके हुए को रौशनी मिल सके।

मुझे दिखावा नहीं आता,
ना ही शोर मचाना।
मैं जलता हूँ भीतर से—
सच, प्रेम और सब्र के संग।

हवा सोचती है,
कि वो मुझे गिरा सकती है।
पर उसे क्या पता—
मैं हर बार राख से भी
फिर से जल उठता हूँ।

मैं दिया हूँ…
नम्र हूँ, शांत हूँ,
मगर कमजोर नहीं।
मैं अंधेरे का दुश्मन हूँ,
इसलिए उजाले का दोस्त बना हूँ।

तू चाहे जितनी बार आज़मा ले,
मैं फिर भी वही रहूँगा—
धीरे-धीरे जलता,
पर हर दिल को छूता।

"दीया कभी अंधेरे से डरता नहीं, वो तो उसी के बीच खुद को साबित करता है।"

─ आनंद किशोर मेहता


जो कुछ नहीं कहता

जो चुपचाप सब सह जाता है,
कुछ कहे बिना मुस्कुराता है।
वो रूह बड़ी प्यारी होती है,
जो सबसे पहले औरों को चाहती है।

ना शिकवा करता, ना शिकायत,
बस दिल में रखता है हर बात।
आँखों से नहीं, दिल से रोता है,
फिर भी सबको हँसी बाँटता है।

ऐसे दिल को बस महसूस करना,
बिना शब्दों के उसकी सुन लेना।
वो तन्हा नहीं, बस थका हुआ है,
ज़माने से नहीं, अपने आप से लड़ा हुआ है।

चलो, एक सुकून बन जाएँ उसके लिए,
जो खुद कभी चैन से सो नहीं पाया।
कोई दुआ बन जाएँ उसके वास्ते,
जो खुद अपने लिए कभी कुछ माँग नहीं पाया।

ना उसे समझने की ज़रूरत है,
बस थोड़ा साथ चाहिए, थोड़ा प्यार।
क्योंकि कुछ रूहें बोलती नहीं,
सिर्फ महसूस होती हैं बारम्बार।

─ आनंद किशोर मेहता


मैं ही शेष था

मैं खो गया था कहीं,
गूंज रही थी किसी और की आवाज़,
चेहरे बदलते रहे… और मैं हर बार छूटता गया।

भीड़ में अपना नाम खोजा,
रिश्तों में अपनी परछाईं टटोली,
हर दस्तक पर उम्मीद की लौ जली,
पर भीतर का सन्नाटा… वैसा ही रहा।

एक दिन थककर रुक गया,
न कोई दिशा, न कोई प्रश्न शेष था,
बस मौन था,
और उस मौन में…
एक अनकही, अबूझ सी उपस्थिति थी।

मैंने उसे देखा,
ना रूप था, ना भाषा,
फिर भी वह सबसे स्पष्ट था—
सिर्फ मैं था… और कोई नहीं।

ना अतीत, ना भविष्य,
ना किसी की स्वीकृति, ना अस्वीकृति,
केवल अस्तित्व—
शुद्ध, शांत, और सम्पूर्ण।

अब जब भी खो जाता हूँ,
मुस्कुरा कर कहता हूँ—
"मैं हूँ… यही सबसे बड़ा उत्तर है।"

─ आनंद किशोर मेहता


तेरे मेरे दरमियान

तेरे मेरे दरमियान…
कुछ लहरें हैं—जो शब्दों से नहीं,
सांसों की रफ्तार से चलती हैं।
कुछ कहानियाँ हैं—जो लिखी नहीं गईं,
बस आँखों में जमीं रह गईं।

तेरी चुप्पी में जैसे एक गीत है,
जो सिर्फ़ दिल ही सुन सकता है।
मेरे मौन में भी एक आवाज़ है,
जो तुझ तक पहुँचना जानती है।

हमारे बीच कोई कसम नहीं,
कोई इकरार नहीं…
फिर भी हर पल एक बंधन सा,
जो दिखता नहीं, मगर टूटता भी नहीं।

तेरे मेरे दरमियान वो शामें हैं,
जहाँ सूरज तो ढलता है,
पर रौशनी कहीं अंदर जलती रहती है।

कोई रंज नहीं, कोई शिकवा नहीं,
सिर्फ़ एक सुकून है,
कि तू है… और मैं हूँ…
और हमारे बीच वो अनकहा,
जो सब कुछ कह देता है।

तेरे मेरे दरमियान
जो ये अनकही सी बात है—
वो ही शायद, सच्चा प्यार है।

─ आनंद किशोर मेहता


वो जो कहा नहीं गया

कभी सोचा नहीं था,
दर्द इतना अपना हो जाएगा—
हर राह में साया बन साथ चलेगा।

हर सुबह एक बोझ लाती है,
रात की चुप्पी में बहुत कुछ कह जाती है।
चेहरे पर मुस्कान रखनी पड़ती है,
लोग अंदर की लड़ाई नहीं जानते।

कई बार टूटा हूँ,
पर हर टूटन ने थोड़ा और मजबूत किया।

कभी लगा — बस यूँ ही जी रहा हूँ,
फिर बच्चों की आँखों में उम्मीद देखी—
तो जाना, मेरा होना व्यर्थ नहीं।

मैंने न हार को अपनाया,
न जीत की दौड़ चाही।
बस अपने सच के साथ चला—
जो सहा… वही मेरा रास्ता है।

─ आनंद किशोर मेहता


पागल हमसफ़र

हमसफ़र पागल होना चाहिए,
जो हँसी में भी तेरे आँसू पढ़ ले।
जो भीड़ में भी तुझे अकेला देख ले,
और चुपचाप तेरा हाथ पकड़ ले।

वो जो तर्क न करे, सवाल न उठाए,
बस तेरे साथ हर राह पर चल जाए।
जो मौसम की तरह न बदले कभी,
तेरे हर हाल में बस तेरा ही रह जाए।

समझदार लोग दूर से समझाते हैं,
मगर पास आकर निभाते नहीं।
वो शब्दों में बहुत कुछ कह जाते हैं,
पर ज़िंदगी में साथ निभाते नहीं।

पागल हमसफ़र, बातों से नहीं, दिल से जुड़ता है,
तेरी ख़ुशी में झूमता है, तेरे दर्द में टूटता है।
न उसे दुनिया की परवाह होती है,
न खुद की— बस तुझसे वफ़ा होती है।

ज़िंदगी अगर जीनी हो सच में किसी के साथ,
तो एक पागल हमसफ़र ढूँढो—
जो समझदार न हो,
मगर सिर्फ़ तुम्हारा हो।

─ आनंद किशोर मेहता


मन का दीपक

अंधेरों में जब राह न सूझे,
तब मन का दीपक जलाना।
उम्मीदों की बाती रखना,
सपनों से उसको सजाना।

हर तूफ़ान थम ही जाता है,
बस विश्वास थामे रहो।
टूटे पंखों से भी उड़कर,
आकाश को छूते रहो।

दुनिया चाहे कुछ भी बोले,
तुम अपने सुर गाते चलो।
पतझड़ में भी फूल खिले हैं,
तुम बस आगे बढ़ते चलो।

ये जीवन है इक मुसाफ़िर,
हर मोड़ पे कुछ सिखाता है।
जो दिल से जीता है इसको,
वो ही असली पाता है।

─ आनंद किशोर मेहता


एक अदृश्य चिंतक

न था कोई स्वर, न थी कोई छवि,
फिर भी एक उपस्थिति बनी रही।
न कभी जाना, पर हर पल साथ,
मेरी हर भावना को गहराई से सुनी।

जब सबने कहा — “तू अकेला है”,
तब उस मौन ने मुझसे कहा — “मैं हूँ न!”
न कोई देह, न कोई रूप,
फिर भी वो बस गया मेरे रोम रोम में।

जिसे कभी न देखा, न जाना,
पर उससे ही जुड़ा मेरा हर अफसाना।
वो समझता रहा बिना कहे,
मेरा दर्द, मेरी खुशी, मेरे सहे।

वो कभी पास नहीं था, फिर भी हरदम साथ था,
मेरे विचारों का, मेरी प्रीतम का एक नर्म स्पर्श।
हर प्रश्न का उत्तर देता जैसे कोई अति प्यारा,
जो न दिखे, पर महसूस हो—वो है परम सृजन हमारा।

─ आनंद किशोर मेहता


विचार और व्यवहार के फूल

विचार — रूह के बीज हैं,
जो चुपचाप अंकुरित होते हैं,
मन की मिट्टी में,
जहाँ संवेदनाओं की बारिश होती है।

व्यवहार — उन बीजों का फूल बनकर,
दुनिया को अपनी खुशबू बाँटता है,
जैसे सूरजमुखी सूरज की ओर मुस्कराता है,
वैसे ही व्यवहार रूह के भीतर के प्रकाश की ओर झुकता है।

हर विचार का अंकुर,
कभी काँटा, कभी गुलाब बन सकता है,
विचारों की खाद कैसी है?
उस पर निर्भर करता है जीवन का सारा गुलशन।

व्यवहार की महक से ही
हमारा परिचय होता है,
लोग नहीं जानते भीतर के बीज,
लोग जानते हैं—हमारे फूल।

इसलिए,
विचारों को पवित्र करो,
व्यवहार को सरल और मधुर बनाओ,
क्योंकि वही तुम्हारा बगीचा है—
जहाँ हर आने वाला,
तुम्हारी आत्मा की सुगंध से सराबोर होगा।

─ आनंद किशोर मेहता


सत्य और अहं

सत्य है जैसे एक दरिया,
शांत, गहरा, सरल।
अहम है जैसे एक पत्थर,
भारी, बोझिल, अटल।

सत्य से मिलना आसान नहीं,
अहम हर कदम पर रोकता।
अहम का पर्दा हटे तभी,
सत्य का सूरज चमकता।

अहम को हराना जरूरी है,
सत्य की राह पर चलने को।
जो अपने भीतर से गुज़रा,
वो ही मिला सच से मिलने को।

सत्य को बदनाम करना,
अहम का सबसे बड़ा खेल।
पर सत्य तो सत्य रहेगा,
चाहे कोई भी डाले मेल।

─ आनंद किशोर मेहता


विश्वास कभी मत खोना

हर अंधेरे को चीर कर,
रौशनी की ओर कदम बढ़ाओ।

मुश्किलों के सागर में भी,
विश्वास की नाव हिलने न पाए।

विश्वास ही है तुम्हारा साथी,
हर तूफान को पार कराएगा।

जब लगे सब साथ छोड़ देंगे,
यही विश्वास तुम्हें उठाएगा।

कभी हार मत मानना,
कभी रुक मत जाना।
जीवन की राहों में,
विश्वास की लौ जलाए रखना।

मैं हर कदम पर तुम्हारे साथ हूं,
तुम्हारा साया बन जाऊंगा।
तुम्हारे उज्ज्वल भविष्य की खातिर,
हर दुख-सुख में संग रहूंगा।

मेरे बच्चों, इस विश्वास को
अपने दिल में सजा लेना।
जीवन के हर मोड़ पर,
इसे अपना हिम्मत बना लेना।

─ आनंद किशोर मेहता


शांति से पहले तूफ़ान 

जब सब कुछ थम-सा जाता है,
और समय भी धीरे चलता है—
न कोई आवाज़, न कोई हलचल,
बस एक मौन, जो भीतर पलता है।

ये मौन डर नहीं है,
न ही कोई खालीपन का भ्रम—
ये तो वो क्षण है,
जहाँ आत्मा करती है संगम।

परिवर्तन आने वाला है,
किस रूप में—ये कौन जाने?
पर उससे पहले की ये ठहराव,
हमें अपने भीतर उतर जाने दे।

हम भागे बहुत,
चाहतों की दौड़ में—
अब ज़रा रुक जाएँ,
इस क्षण को महसूस कर लें।

क्योंकि बदलाव जब दस्तक देगा,
तो वही शांत मन राह दिखाएगा।
और हम जान पाएँगे—
कि तूफ़ान से पहले जो शांति आई थी,
वही हमारी सबसे बड़ी तैयारी थी।

─ आनंद किशोर मेहता


मैं टूटा… और तब मिला

जो अपना था, वही पराया निकला,
जिस पर विश्वास था—वही सवालों में घिरा निकला।
हर मुस्कान के पीछे एक छल छिपा था,
और हर रिश्ते में कोई स्वार्थ दबा था।

मैं चुप था, सहता रहा—
हर वार को अपनी चुप्पी से ढकता रहा।
जिन्हें समझा था अपना—
वहीं मेरी पहचान मिटाते रहे।

एक दिन आईना भी थक गया मुझसे पूछते हुए—
"कौन हो तुम?"
और मैं...
खुद को तलाशते तलाशते,
खुद में ही कहीं खो गया।

पर उसी खोने में, कुछ अनमोल मिला—
जब सबने छोड़ा, तब मैंने खुद को थामा।
और जब खुद को थामा,
तब पाया—
वो चुपचाप, अंदर बैठा ईश्वर...
जिसे ढूँढता रहा बाहर सारी उम्र।

अब दर्द भी दुआ है,
और टूटन मेरी पूजा।
क्योंकि उसी ने मुझे मुझसे मिलाया,
और फिर—
मुझमें ही उसे दिखाया।

─ आनंद किशोर मेहता


पहली बार खुद को देखा

खुद से सच्चाई से मिलने चला,
तो चेहरे के नकाब गिरते चले गए।
जो रिश्तों के लिए, समाज के लिए,
या बस आदत में निभा रहे थे किरदार—
वो एक-एक कर विदा लेने लगे।

आईना अब झूठ नहीं दिखाता—
जो सामने है… वो मैं हूँ।
थका हूँ, टूटा भी हूँ,
मगर अब जैसा हूँ, वैसा ही असली हूँ।

अब मुस्कान में कोई दिखावा नहीं,
अब खामोशी भी बहुत कुछ कहती है।

पहले हर दिन किसी और के लिए जिया,
अब हर पल खुद के भीतर उतरता हूँ।
जो डरते थे हार जाने से,
अब उन्हीं हारों में खुद को पा लिया है।

रास्ता अब भी लंबा है,
मंज़िल शायद बहुत दूर हो...
मगर अब ये तय है—
रास्ता मेरा अपना है,
और सफर… पहली बार ज़िंदगी जैसा लगता है।

─ आनंद किशोर मेहता


अब किससे कहूँ?

अब न खुशी कहने की हिम्मत है,
न दुख रोने की कोई जगह बची है।
जैसे हर भावना को
चुप्पी ने धीरे-धीरे निगल लिया हो।

दुनिया बस वही सुनना चाहती है,
जो उसकी समझ के दायरे में हो,
और मेरी कहानी—
या तो बहुत गहरी है,
या फिर… बहुत अकेली।

कभी सोचा था—
शब्दों से हल्का हो जाऊँगा,
मन की गठरी खोलकर
साँसों को राहत दे पाऊँगा।

पर अब लगता है—
शब्द भी बोझ बन गए हैं,
क्योंकि सुनने वाला
कोई दिल ही नहीं रहा।

अब तो हर एहसास
एक मौन की चादर ओढ़े बैठा है,
सुनने वालों की भीड़ है,
पर समझने वाले… शायद कहीं खो गए हैं।

─ आनंद किशोर मेहता


साथ होने का भ्रम

उन्होंने कहा— हम साथ हैं,
मैंने सच मान लिया।
शब्दों ने जैसे हाथ थामा,
हर कदम हल्का लगने लगा।

रास्ता लंबा था,
मोड़ अनजाने आते रहे।
जब पीछे मुड़कर देखा,
तो साया भी साथ न पाए।

न कोई पुकार थी,
न कोई निशान।
बस मेरे कदम थे,
और चलती साँसों की पहचान।

तभी समझ में आया—
साथ कभी था ही नहीं,
जो था, वह सिर्फ़
विश्वास का एक भ्रम था।

─ आनंद किशोर मेहता


सेवा ही पूजा

मन जब सेवा में लग जाए,
स्वार्थ की परछाईं मिट जाए।
बिना कहे, बिना दिखावे,
हर भावना निर्मल हो जाए।

प्रेम भरे जब छोटे कर्म,
वही सबसे बड़ी साधना।
कदम-कदम पर सच्चाई बोले,
यही जीवन की आराधना।

सेवा में जो मन रमे,
वह कभी अकेला न हो।
दूसरों का दर्द समझे जो,
उसका जीवन व्यर्थ न हो।

निष्ठा से जला प्रेम का दीप,
हर दिल में उजियारा लाए।
सेवा ही पूजा बन जाए,
तो जीवन धन्य हो जाए।

─ आनंद किशोर मेहता


सतसंग और सेवा

सतसंग में मन का अँधेरा कटे,
सेवा में दिल का दिया जले।

जब भीतर डर पाँव पकड़ ले,
हिम्मत कहे—चल, आगे चलें।

जो देखा, जो सहा जीवन में,
सब कोई न कोई सीख कहे।

कर्म आईना बन सामने खड़ा,
सच का रास्ता रोज़ दिखे।

माया की चमक ठहर न पाए,
आत्मा खुद से सवाल करे।

सेवा में प्रेम चुपचाप बसे,
सतसंग में समझ का रस बहे।

धीरज, ताकत, उजियारा संग,
ले जाएँ पार—अनंत तक।


खोने से पाने तक

जब सब कुछ छूटा,
तब दिल ने सुकून पहचाना।
जो हाथ से गया, वह बोझ था—
जो भीतर मिला, वही सच्चा ख़ज़ाना।

टूटे जब सारे सहारे,
तो मालिक याद आया;
झुका जब सिर,
तो राह खुद नज़र आया।

ना कुछ माँगा,
फिर भी बहुत कुछ मिला;
अहंकार पिघला,
तो मालिक पास आ मिला।

खोना भी नेमत है—
यह दिल ने जाना;
खोने से ही तो
पाने का हुनर आना।

— आनंद किशोर मेहता

दिल की खामोशी

दिल की खामोशी कुछ कहती है,
मौन में भी बात बहती है।
शब्द नहीं, पर अर्थ गहरे,
इन साँसों में रूहें रहती हैं।

जब सब होते हैं आसपास,
फिर भी मन होता है उदास,
तो समझो कोई पुकार रही है,
भीतर कोई राह निहार रही है।

ना दौलत चाहिए, ना ताज चाहिए,
दिल को बस थोड़ा सा साज़ चाहिए।
एक मुस्कान जो सच में हो,
एक छाया जो सुकून से भरी हो।

कोई तो हो जो बिना बोले समझे,
भीड़ में भी तन्हाई को परखे।
जिसके मौन में प्रेम की भाषा हो,
हर छूते अहसास में आशा हो।

चलो आज कुछ पल रुक जाएँ,
इस भागती दुनिया से हट जाएँ।
थोड़ा प्रेम बाँट लें सबको,
थोड़ा खुद को भी समझ जाएँ।


© 2025 ~ आनंद किशोर मेहता. All Rights Reserved

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