🌼 नम्रता का शिखर — प्रेम का ध्वज 🌼
मैं इतना झुका,
इतना सरल, इतना विनम्र बना
कि दुनिया की हैरानी भी
क्षणभर को ठहर गई।
अगर इससे भी नीचे झुकाने की
किसी को चाहत हो—
तो बस एक संकेत दे देना;
शायद मैं राह से भटक गया हूँ,
ताकि अपनी ही रोशनी में लौटकर
सही मार्ग फिर पहचान सकूँ।
और जब नम्रता की
हर कसौटी पूरी हो चली,
तो आओ—अब सब मिलकर
रा धा/ध: स्व आ मी🙏
दयाल के पावन संदेश को
प्रेम, शांति और
मालिक की दया–मेहर की
अनंत अनुकंपा के साथ
पूरे विश्व में गूँजाएँ।
उन्नत कर दें वह ध्वज,
जो करुणा का प्रतीक है—
और उसे ऐसा गगनचुंबी बना दें
कि वह केवल पृथ्वी पर नहीं,
सारे ब्रह्मांड में
झूम-झूम कर लहराए।
✍️ Anand Kishor Mehta
Bhadeji Centre, Gaya (Bihar)
नीरज भाई साहब, आपकी कल की गहन और प्रेरक बातचीत से प्रभावित होकर मैंने एक कविता रची और इसे यहां गूगल ब्लॉगर पर साझा किया। यह कविता मानव सोच की विशालता और अंतर्मन की गहराई को उजागर करती है।
हार्दिक रा धा/ध स्व आ मी 🙏
Comments
Post a Comment