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दयालबाग: “खेत सिक्युरिटी सेवा की झलक” 2024

दयालबाग: “खेत सिक्युरिटी सेवा की झलक” 

AUTHOR: ANAND KISHOR MEHTA Gmail:pbanandkishor@gmail.com 

कविता:

दयालबाग: “खेत सिक्युरिटी सेवा की झलक”.  (सेवा के पावन अनुभवों पर आधारित एक सहज और सुंदर कविता).                   

— आनन्द किशोर मेहता

सेवा का जब अवसर मिला,
मन प्रेम और आनंद में झूमा।

पावन खेतों की इस धरा पर,
हर क्षण अमृत सा लगा।

हरियाणा–राजस्थान संग सटा,
यह समर्पण का पुण्य शिविर।

जहाँ प्रेमी जुटे निरंतर,
सेवा की लय में रमे।

बिना विश्राम, बिना अवकाश,
हर पल सेवा में डूबे।

जहाँ चरण पड़े मालिक के,
वहीं खिल उठी प्रेम की आभा।

यमुना की लहरों पर नौका-विहार,
सेवा ने और रस भर दिया।

यमुना तीरे सेवा में मग्न,
स्वयं को हम भूल गए।

सुबह, दोपहर, शाम और रात,
सेवा का क्रम यूँ चलता रहा।

एक गज की दूरी से दर्शन,
प्रेम-सागर में समा गए।

कृपा से धन्य हुआ अवसर,
हृदय में उत्साह अमर।

हे मालिक! दया बनाए रखना,
प्रेम और भक्ति सदा खिले।


(दिनांक: 23 जून २०२४)

दयालबाग: “खेत सिक्युरिटी सेवा की झलक”

(भदेजी सेंटर की कहानी) 

सतसंग की सेवा का अवसर पाना स्वयं में एक सौभाग्य होता है, और जब सेवा का स्थान दयालबाग के पवित्र खेत हों, तो यह अवसर एक दिव्य वरदान बन जाता है।

पिछले वर्ष की भांत इस वर्ष भी भदेजी सतसंग सेंटर के छह प्रेमियों को जब २२ जून से १ जुलाई २०२,४ तक दयालबाग खेत सिक्योरिटी सेवा का सौभाग्य प्राप्त हुआ, तो वे हर्ष और श्रद्धा से भर उठे। यह केवल एक सेवा यात्रा नहीं थी, बल्कि जीवन को बदल देने वाला एक आध्यात्मिक अनुभव था।


प्रारंभ: सेवा भूमि पर पहला कदम

दयालबाग पहुँचते ही प्रेमियों ने पाया कि हरियाणा और राजस्थान कैंप एक-दूसरे से सटे हुए थे, और चारों ओर शांति और दिव्यता का अद्भुत वातावरण था। यहाँ की हवा में ही एक अजीब-सी शीतलता और आध्यात्मिक ऊर्जा थी, मानो यह भूमि केवल सेवा और समर्पण के लिए ही बनी हो।

जब प्रेमी अपने सुरक्षा सेवा के दायित्व में लगे, तो उन्हें महसूस हुआ कि यह सेवा केवल शारीरिक परिश्रम नहीं थी, बल्कि यह मालिक के चरणों में पूर्ण आत्मसमर्पण की अनुभूति थी।


आंचल भाई: स्वयं सेवा का प्रतीक

खेत सिक्योरिटी सेवा के प्रभारी प्रेमी भाई आंचल लाल सूरा जी थे। उनके समर्पण को देखकर प्रेमियों के मन में गहरी श्रद्धा और प्रेरणा जाग उठी।

आंचल भाई बिना रुके २४ घंटे सेवा में तल्लीन रहते थे।
कभी किसी ने उन्हें आराम करते नहीं देखा।

"भाई साहब, आप थकते नहीं?"
एक प्रेमी ने जिज्ञासा से पूछा।

वे हल्के से मुस्कुराए और बोले,
"सेवा में थकावट नहीं, केवल आनंद होता है। जब हृदय मालिक की भक्ति में लीन हो, तो विश्राम स्वयं ही तुच्छ हो जाता है।"

यह सुनकर प्रेमियों ने जाना कि सच्ची सेवा वह है, जहाँ तन की नहीं, मालिक की शक्ति काम करती है।


युगल जी: सतत जागरूकता का प्रतीक

प्रेमी भाई युगल जी, जो खेत सिक्योरिटी सेवा के सुपरवाइजर थे, वे भी २४ घंटे सेवा में सतत उपस्थित रहते।

उनकी जागरूकता, समर्पण और अनुशासन को देखकर प्रेमियों को समझ आया कि एक सेवक को हमेशा सतर्क, जागरूक और हर परिस्थिति के लिए तैयार रहना चाहिए।

"सेवा केवल कर्तव्य नहीं, यह मालिक से सीधा जुड़ने का एक माध्यम है।"
युगल जी की यह बात प्रेमियों के हृदय में गहराई तक समा गई।


२६ जून: सेवा में सूरत सिमट गई

२६ जून को एक अद्भुत घटना घटी।

एक प्रेमी यमुना के तट पर सेवा में इतना लीन हो गया कि समय का कोई भान ही न रहा।
लगातार छह घंटे तक वह ध्यानावस्था में बैठा रहा, मानो मालिक की कृपा बरस रही हो।

जब उसकी चेतना लौटी, तो उसने महसूस किया कि यह सेवा केवल बाहरी नहीं, बल्कि एक आंतरिक अनुभव भी है।

"यह सेवा नहीं, यह तो मालिक की गोद में बैठने जैसा था!"


२८ जून: मालिक जी के निकट सेवा का अनुपम सौभाग्य

२८ जून की सुबह एक सर्वोच्च अनुभव लेकर आई।

यमुना नदी में नौका विहार के लिए मालिक जी पधारे।
वैसे तो मुझे मालिक जी के बहुत निकट से सेवा के कई अद्भुत अवसर मिला। लेकिन एक दिन जब मालिक जी नौका विहार के लिए यमुना तट पर तशरीफ लाए तो इस दिन नाव के पास मुझे बिल्कुल पास में सेवा का अदभुत अवसर प्राप्त हुआ । 

  सूरत रोमांचित हो उठा।
आँखे दीनता से नम्र हो गई ।
मन ने कहा,
"क्या यह स्वप्न है? या सच में मालिक ने इतनी दया-मेहर कर दी?"

उसी क्षण मुझे समझ आया कि सच्चे प्रेम और सेवा में ही मालिक के साक्षात दर्शन होते हैं।


३० जून: जब सेवा का अर्थ समझ आया

३० जून को प्रेमियों ने कुछ ऐसा देखा, जिसने उनके मन में सेवा का वास्तविक अर्थ स्पष्ट कर दिया।

दयालबाग के प्रत्येक कोने में प्रेमी सेवा में लीन थे—
कोई खेतों में, कोई स्वच्छता अभियान में, तो कोई भोजन सेवा में।

हर व्यक्ति अपने-अपने कार्य में पूर्ण रूप से समर्पित था।

"यहाँ तो कर्मयोग जीवंत रूप में प्रकट हो गया है!"
प्रेमियों का सिर स्वयं झुक गया।

यह देखकर उन्होंने जाना कि सेवा केवल एक कार्य नहीं, यह जीवन जीने की एक पद्धति है।


१ जुलाई: "सेवा का पवित्र प्रकाश रोम-रोम बस गई।"

दस दिनों की सेवा के बाद, भदेजी सेंटर के दो बुजुर्ग प्रेमी घर लौटने को तैयार थे।

उनके कंधे पर भारी बैग थे, पर उनके चेहरे पर थकान की जगह संतोष और ऊर्जा की चमक थी।

"हम लौट तो रहे हैं, पर हमारा मन यहीं रह गया है।"
एक प्रेमी ने भावुक होकर कहा।

यह केवल एक सेवा यात्रा नहीं थी, यह जीवनभर की एक अनमोल स्मृति बन गई।


सेवा का सार: एक अमर शिक्षा

दयालबाग खेत सिक्योरिटी सेवा ने प्रेमियों को यह सिखाया कि—

  • सेवा केवल शारीरिक परिश्रम नहीं, यह आत्मिक उन्नति का मार्ग है।

  • जब सेवा समर्पण और निष्ठा से की जाए, तो मालिक स्वयं उसे स्वीकार करते हैं।

  • सच्चा सेवक वह नहीं जो केवल कार्य करता है, बल्कि वह है जो हृदय से मालिक के चरणों में स्वयं को अर्पित कर देता है।

यह सेवा पूरी तो हो गई, पर इसका प्रभाव जीवनभर प्रेमियों के हृदय में अमिट रहेगा।


समर्पण की यह कहानी हर प्रेमी के लिए प्रेरणा बनेगी।

क्योंकि सेवा केवल एक कर्म नहीं, यह स्वयं मालिक से मिलने का मार्ग है।

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Author: Anand Kishor Mehta 

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