जब स्वार्थ टूटेगा, तब परमार्थ गूँजेगा
आज का मानव जीवन अक्सर स्वार्थ और व्यक्तिगत इच्छाओं के घेरे में फँसा दिखाई देता है। जिसे छोड़ना कठिन लगे, वही सबसे बड़ा बंधन बन जाता है। यही बंधन आज हमारे समाज का सबसे प्रमुख जाल है — स्वार्थ। हम इसे कभी-कभी स्वतंत्रता समझ लेते हैं, जबकि यह केवल हमारी दृष्टि और कर्मों को सीमित करने वाली जंजीरें हैं।
स्वार्थ का त्याग किसी वास्तविक मृत्यु का संकेत नहीं देता; यह तो पुराने अहंकार, भ्रम और सीमाओं का अंत है। पर यह सत्य समझने में समय लगता है। हर हृदय में परमार्थ का बीज मौजूद है, लेकिन स्वार्थ की परतें उसे ढक देती हैं। इसलिए हम भीतर से महसूस करने के बावजूद उसे अपनाने में असमर्थ रहते हैं।
फिर भी, समय और अनुभव की शक्ति अद्भुत है। जब स्वार्थ अपने ही भार से टूटेगा, तब परमार्थ स्वतः आकर्षण बन जाएगा। यह आकर्षण घोषणाओं से नहीं, बल्कि शांत और निस्वार्थ कर्मों से फैलता है। यही शक्ति है, जो धीरे-धीरे समाज और व्यक्तियों को बदल देती है।
जब ‘मैं’ से मन भर जाएगा, तब ‘हम’ की ओर यात्रा स्वाभाविक रूप से शुरू होगी। यह यात्रा कठिन या बोझिल नहीं होगी, बल्कि जीवन की वास्तविक गहराई और अर्थ का अनुभव कराएगी। परमार्थ कोई त्याग नहीं है; यह जीवन को पूर्णता और आनंद देने वाला मार्ग है।
स्वार्थ ने हमें सुविधा दी, पर शांति छीन ली। परमार्थ त्याग की माँग करता है, लेकिन जीवन को वास्तविक अर्थ और आनंद प्रदान करता है। यही वह बदलाव है, जो आने वाले समय में मानव चेतना में घटित होगा। जब लोग स्वार्थ छोड़कर परमार्थ की ओर आकृष्ट होंगे, तब चारों ओर उसकी गूँज सुनाई देगी — शब्दों में नहीं, बल्कि कर्म और जीवन के हर पहलू में।
आनन्द किशोर मेहता

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