संस्था का पूर्ण विकास और छिपी प्रतिभाओं का महत्व 
किसी भी संस्था की वास्तविक शक्ति उसकी इमारतों, संसाधनों या बाहरी व्यवस्थाओं में नहीं, बल्कि उसके सदस्यों के भीतर निहित छिपी प्रतिभाओं में होती है। प्रत्येक भाई और बहन अपने भीतर किसी न किसी रूप में विशिष्ट गुण, कला, अनुभव और क्षमता संजोए रहता है। यदि इन प्रतिभाओं को पहचानकर संगत और समाज के हित में उपयोग न किया जाए, तो संस्था का विकास स्वाभाविक रूप से अधूरा रह जाता है।
संस्था केवल नियमों और संरचनाओं के सहारे नहीं चलती; वह अपने सदस्यों की सक्रिय सहभागिता, समर्पण और सृजनशीलता से आगे बढ़ती है। जब किसी सदस्य को अपनी प्रतिभा प्रकट करने का अवसर मिलता है, तो वह केवल व्यक्तिगत योगदान ही नहीं देता, बल्कि संस्था की आत्मा को भी समृद्ध करता है। संगीत, लेखन, प्रबंधन, तकनीक, शिक्षण, कृषि, सेवा या संगठन—हर क्षेत्र में छिपी क्षमताएँ संस्था को नई ऊँचाइयों तक ले जाने की सामर्थ्य रखती हैं।
अक्सर संकोच, अवसरों की कमी या उचित मार्गदर्शन के अभाव में अनेक योग्य व्यक्ति पीछे रह जाते हैं। परिणामस्वरूप संस्था एक विशाल संभावनाशील शक्ति से वंचित हो जाती है। यदि नेतृत्व सजग और संवेदनशील होकर प्रत्येक सदस्य की क्षमता को पहचानने, उसे प्रोत्साहित करने और सही दिशा देने का प्रयास करे, तो सामूहिक ऊर्जा का एक अद्भुत प्रवाह उत्पन्न हो सकता है।
जब प्रतिभाएँ संगत के हित में समर्पित होती हैं, तब वातावरण में उत्साह, एकता और प्रेरणा का संचार होता है। प्रत्येक व्यक्ति स्वयं को महत्वपूर्ण और सम्मानित अनुभव करता है। यही भावना संस्था को भीतर से सशक्त और जीवंत बनाती है। विविध प्रतिभाएँ मिलकर ऐसी सामूहिक शक्ति का निर्माण करती हैं, जो किसी भी चुनौती का दृढ़ता से सामना कर सकती है।
पूर्ण विकास का अर्थ केवल बाहरी विस्तार नहीं, बल्कि आंतरिक समृद्धि भी है। जिस संस्था में प्रत्येक सदस्य को अपनी क्षमता के अनुरूप सेवा का अवसर मिलता है, वहाँ निरंतर नवाचार, आत्मीयता और प्रगति बनी रहती है। इसके विपरीत, जहाँ प्रतिभाएँ उपेक्षित रह जाती हैं, वहाँ ठहराव और सीमित विकास स्वाभाविक हो जाता है।
अतः आवश्यक है कि संस्था के भीतर ऐसा सकारात्मक और प्रोत्साहनपूर्ण वातावरण निर्मित किया जाए, जहाँ हर भाई और बहन निडर होकर अपनी प्रतिभा व्यक्त कर सके। पहचान, प्रोत्साहन और मार्गदर्शन—ये तीन आधार-स्तंभ किसी भी संस्था को पूर्ण विकास की ओर अग्रसर करते हैं।
अंततः, संस्था की वास्तविक उन्नति तभी संभव है जब वह अपने सदस्यों की छिपी क्षमताओं को पहचानकर उन्हें संगत और समाज की सेवा में रूपांतरित करे। क्योंकि जब हर प्रतिभा प्रकाश में आती है, तभी संस्था सच मायनों में प्रकाशित होती है।
— आनन्द किशोर मेहता
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