जीवन में परम पिता कुल मालिक का प्रथम स्पर्श
(एक हृदय-स्पर्श अनुभव — जो मालिक की असीम दया और मेहर से प्रस्फुटित हुआ)
कुछ अनुभव इतने आत्मिक होते हैं कि वे शब्दों से नहीं, केवल अंतःकरण की गहराई में ही महसूस किए जा सकते हैं। मेरे जीवन में भी ऐसा ही एक क्षण तब आया, जब मैंने पहली बार भीतर से मालिक जी के स्पर्श को अनुभव किया। मेरे दादा जी का मालिक जी के प्रति जो निःस्वार्थ प्रेम, भक्ति और समर्पण भाव था — वही मेरे बालमन में ऐसा गहरा संस्कार बनकर उतर गया, जिसे मैं आज भी अपने हृदय में संजोए हुए हूँ। उनका शांत चेहरा, संयमित जीवन और मौन तपस्या — मेरे लिए पहली जीवित सतसंग की पुस्तक बन गए।
"दादा जी को देखकर जो भाव और संस्कार मेरे भीतर जन्मे — वे किसी उपदेश से नहीं, एक मौन आत्मिक छाया से उपजे थे। वह मालिक जी का पहला स्पर्श था — अमूल्य और अवर्णनीय।"
इन्हीं संस्कारों के कारण, जब परम प्रिय परम गुरु डॉक्टर एम.बी. लाल साहब के प्रति भीतर ही भीतर एक गहन संबंध का अनुभव हुआ — तो ऐसा लगा मानो अंतःकरण में कोई भूली-बिसरी मधुर धुन फिर से जाग उठी हो।
"पहली बार जब भीतर संपर्क की वह झनझनाहट हुई, तो दिल तार-तार हो गया — परम प्रेम से भीगा हुआ, जैसे रूह और परम पिता के बीच कोई सूक्ष्म आलिंगन घटा हो।"
और फिर वह अनुपम क्षण आया — जब जुलाई 1981 में खेत सेवा के दौरान, धान रोपनी के समय जब मैं, सेवा में लीन था — तभी परम प्रिय ग्रेसेस हुजूर डॉक्टर लाल साहब मेड से चलते हुए मेरे पास आए... और अत्यंत दया व मेहर भरी स्वर में बोले — “सतसंग और सेवा से हमेशा जुड़े रहना।”
यह कोई साधारण वाक्य नहीं था — यह मेरे जीवन का दीप बन गया। वह क्षण मेरे जीवन की सबसे कीमती घड़ी बन गई, जब पहली बार यह अहसास हुआ — मालिक जी ने मुझे चुन लिया है, छू लिया है।
"यही बीज आगे चलकर मेरे जीवन में सेवा, सतसंग और आत्मिक जीवन का मूल स्तंभ बना।”
चरणों की शरण — गुरु महाराज का प्रेमिल आलिंगन
जिस ईश्वरीय बीज ने मेरे भीतर नई जीवनयात्रा का आरंभ किया, वही आज हमारे पूरे परिवार के जीवन में आश्रय और ऊर्जा बन चुका है — गुरु महाराज डॉ. सतसंगी साहब की करुणामयी छाया में। उन्होंने न केवल मुझे, बल्कि मेरे पूरे परिवार को अपने चरणों में समेटकर अपनाया — जैसे वर्षों से खोया कोई आत्मिक संबंध पुनः जीवित हो गया हो।
"उनका प्रेम, असीम दया व मेहर और मालिक जी से रूह का वह जुड़ाव — यह अनुभूति शब्दों से परे है। वहाँ भाषा मौन हो जाती है, और अनुभूति स्वयं बोल उठती है।"
उनकी छाया में जीवन का हर क्षण सुरक्षित लगता है। हर संकट जैसे मौन आशीर्वाद में घुलकर हल्का हो जाता है।
"गुरु महाराज की असीम दया व मेहर एक पिता के छांव जैसी है — जो बिना कुछ कहे, हमारे आंसुओं को चुपचाप पोंछ देते हैं।"
यह केवल भक्ति नहीं, यह सम्पूर्ण समर्पण है — जहाँ जीवन अब मेरा नहीं, बल्कि गुरु चरणों में अर्पित प्रवाह बन चुका है। हमारा पूरा परिवार — हर दिन, हर क्षण — गुरु महाराज के प्रेम, मार्गदर्शन और संरक्षण में नतमस्तक होकर जीवन जी रहा है।
हमारा परिवार — सेवा में रचा-बसा
हम दोनों (माता-पिता के रूप में), मैं और मेरी धर्मपत्नी — हमने जीवन को एक मिशन की तरह जिया है। हमारा उद्देश्य केवल बच्चों को शिक्षित करना नहीं, बल्कि उन्हें संवेदनशील, सेवा-निष्ठ और आध्यात्मिक मूल्यों से भरपूर बनाना रहा है। हमने उपदेशों से अधिक, अपने आचरण से उन्हें जीवन का मार्ग दिखाया। सेवा, संघर्ष और निःस्वार्थ समर्पण से ऐसा वातावरण बनाया, जिसमें वे सहज रूप से मालिक की सेवा और मानवता के हित में अपने कदम बढ़ाते चले गए।
बड़ी बेटी — आरती सतसंगी
आरती, हमारी पहली संतान, हमारी अंतःकरण का एक सुंदर विस्तार है। 12वीं के बाद उसने दयालबाग से गारमेंट टेक्नोलॉजी की शिक्षा प्राप्त की। मालिक की असीम दया व मेहर से, उसकी शादी पढ़ाई पूरी होते ही दयालबाग में ही हुई — जहाँ यह पवित्र संयोग स्वयं मालिक जी के चरण-कमलों को साक्षी मानकर संपन्न हुआ। उसका जीवन-साथी अजय कुमार सतसंगी न केवल सेवा-भाव और कर्तव्यनिष्ठा से पूर्ण हैं, बल्कि उन्होंने आरती को पूरे हृदय से अपनाकर हमारे परिवार को एक नई आत्मिक ऊर्जा दी।
आरती ने गृहस्थ जीवन को भी सेवा का माध्यम बना लिया है। वह न केवल परिवार को प्रेम, श्रद्धा और जिम्मेदारी से संभालती है, बल्कि दयालबाग में मालिक जी की सेवा में भी निरंतर तत्पर रहती है।
"उसका जीवन इस बात का सजीव प्रमाण है कि एक गृहिणी भी, यदि उसमें श्रद्धा, समर्पण और सेवा की भावना हो, तो वह सहज ही आध्यात्मिक ऊँचाइयों को छू सकती है।"
दामाद – अजय कुमार सतसंगी
हमारे दामाद अजय कुमार सतसंगी, दयालबाग की सब्ज़ी दुकान के मैनेजर के रूप में वर्षों से ईमानदारी, कर्तव्यनिष्ठा और निःस्वार्थ सेवा का उदाहरण बने हुए हैं।
"उनकी सेवा केवल कर्तव्य नहीं, बल्कि भक्ति है — जिसमें कर्म और श्रद्धा एक हो गए हैं।"
नातिन — दया सत्संगी
दया, हमारी आरती बेटी की प्यारी दुलारी संतान, मालिक जी की असीम दया और मेहर से उसके जीवन में एक वरदान की तरह आई। अपने नाम की तरह ही वह करुणा, विनम्रता और गहराई से परिपूर्ण है। छोटी उम्र में ही उसमें सेवा, अनुशासन और स्नेह की झलक स्पष्ट दिखाई देती है।
"वह हमारे परिवार की सेवा-परंपरा की एक नई कड़ी है — भविष्य की वह आशा, जो इसे अगली ऊँचाइयों तक ले जाएगी।"
छोटी बेटी – शब्द प्यारी मेहता
शब्द प्यारी, हमारे विचारों की वह संतान है, जिसने शिक्षा को केवल कैरियर नहीं, बल्कि समाज सेवा का एक सशक्त माध्यम बनाया।
वह आज राजाबरारी (आदिवासी क्षेत्र) के हाई स्कूल में शिक्षिका के रूप में कार्यरत है।
"उसका वहाँ जाना कोई साधारण निर्णय नहीं था — बल्कि एक सेवा-निष्ठ अंतःकरण की आवाज़ थी। जो समाज के सबसे उपेक्षित बच्चों के लिए आशा बनकर पहुँचा।"
वह वहाँ केवल शिक्षा ही नहीं दे रही, बल्कि आत्मबल, संस्कार और आत्मगौरव का भी संचार कर रही है।
अंतिम भाव: एक संकल्प, एक ध्येय, एक जीवन
हमारा विश्वास है कि — हर प्राणी को सेवा का अवसर देना ही सबसे बड़ी पूजा है। हमने यही संस्कार अपनी संतानों को दिए, और आज वे उसी मार्ग पर श्रद्धा और आत्मिक ऊर्जा से बढ़ रही हैं।
हमारी सबसे बड़ी पूँजी — न धन है, न संपत्ति — बल्कि वे संस्कार हैं, जो हर पीढ़ी में और भी गहरे उतरते जा रहे हैं।
“हमारा घर एक स्नेह और संस्कारों की परंपरा है — जहाँ आरती की आराधना है, अजय जी की सेवा है, दया की करुणा है, शब्द प्यारी की शिक्षा है, और हमारे दादा-दादी की मौन छाया है।”
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