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जीवन में परम पिता कुल मालिक का प्रथम स्पर्श

जीवन में परम पिता कुल मालिक का प्रथम स्पर्श  (एक हृदय-स्पर्श अनुभव — जो मालिक की असीम दया और मेहर से प्रस्फुटित हुआ) कुछ अनुभव इतने आत्मिक होते हैं कि वे शब्दों से नहीं, केवल अंतःकरण की गहराई में ही महसूस किए जा सकते हैं। मेरे जीवन में भी ऐसा ही एक क्षण तब आया, जब मैंने पहली बार भीतर से मालिक जी के स्पर्श को अनुभव किया। मेरे दादा जी का मालिक जी के प्रति जो निःस्वार्थ प्रेम, भक्ति और समर्पण भाव था — वही मेरे बालमन में ऐसा गहरा संस्कार बनकर उतर गया, जिसे मैं आज भी अपने हृदय में संजोए हुए हूँ। उनका शांत चेहरा, संयमित जीवन और मौन तपस्या — मेरे लिए पहली जीवित सतसंग की पुस्तक बन गए। "दादा जी को देखकर जो भाव और संस्कार मेरे भीतर जन्मे — वे किसी उपदेश से नहीं, एक मौन आत्मिक छाया से उपजे थे। वह मालिक जी का पहला स्पर्श था — अमूल्य और अवर्णनीय।" इन्हीं संस्कारों के कारण, जब परम प्रिय परम गुरु डॉक्टर एम.बी. लाल साहब के प्रति भीतर ही भीतर एक गहन संबंध का अनुभव हुआ — तो ऐसा लगा मानो अंतःकरण में कोई भूली-बिसरी मधुर धुन फिर से जाग उठी हो। "पहली बार जब भीतर संपर्क की वह ...

स्वाभिमान (Self-Respect)— आंतरिक शक्ति का मूल स्तंभ —

स्वाभिमान (Self-Respect)  — आंतरिक शक्ति का मूल स्तंभ — स्वाभिमान का अर्थ स्वाभिमान वह गहरी आत्म-मान्यता और गरिमा की भावना है, जो तब जन्म लेती है जब हम अपने मूल्यों, विश्वासों और ईमानदारी के अनुसार जीवन जीते हैं। यह दूसरों की प्रशंसा पर निर्भर नहीं करता, बल्कि इस पर आधारित होता है कि हम स्वयं को कैसे देखते और कैसे समझते हैं। स्वाभिमान के प्रमुख तत्व 1. आत्म-स्वीकृति • अपनी शक्तियों और कमजोरियों को बिना कठोर आलोचना के स्वीकार करना। • अपने अस्तित्व और बीते निर्णयों से संतुष्ट रहना। 2. व्यक्तिगत सीमाएँ (Boundaries) • जहाँ आवश्यक हो “न” कह पाने का साहस। • मानसिक, भावनात्मक और शारीरिक सीमाओं की रक्षा करना। 3. गरिमामय आचरण • ईमानदारी और न्याय के साथ कार्य करना — चाहे कोई देखे या न देखे। • अपने अंतरात्मा के अनुरूप निर्णय लेना। 4. आत्म-संतुष्टि • दूसरों की प्रशंसा या मान्यता पर निर्भर न रहना। • अपनी अंतरात्मा और विवेक पर विश्वास रखना। 5. आलोचना का संतुलित सामना • बिना टूटे सुनना और समझना। • सीख लेना — परंतु आत्म-मूल्य को न खोना। स्वाभिमान क्यों महत्वपूर्ण है? • ...

क्या यह इंसानों की बस्ती है?

क्या यह इंसानों की बस्ती है?  लेखक: आनंद किशोर मेहता सुबह उम्मीद लेकर आती है। हर गली, हर मोहल्ला, हर घर—एक नई शुरुआत की संभावना से भरा होता है। हर नया दिन जीवन को बेहतर बनाने का एक अवसर लगता है। लेकिन कुछ बस्तियों में सुबह शांति नहीं, शोर लेकर आती है। कहीं गालियाँ, कहीं दरवाज़ों की पटकन। मोहल्ला घरों की जगह रोज़-रोज़ के झगड़ों का अखाड़ा बन जाता है— जहाँ न कोई सुनना चाहता है, न समझना; सब बस बोलना चाहते हैं। हताशा, कुंठा और अधूरी इच्छाएँ लोग अपने जीवन का बोझ एक-दूसरे पर फेंककर हल्का होना चाहते हैं। कोई खुद को चोट पहुँचाता है, कोई दूसरों की आवाज़ दबाकर खुद को सही साबित करता है, कोई चुप रहकर भीतर घुटता है, और कोई नशे में शांति ढूँढता है— जो कुछ देर के लिए आवाज़ें तो दबाता है, हालात नहीं। क्या यही मानवता है? क्या यही सभ्यता है? क्या इस शोर में वे मूल्य खो नहीं गए— सहनशीलता • संवाद • समझ • संयम यह केवल एक गली की कहानी नहीं। यह एक गहरी सामाजिक बीमारी का संकेत है। हम दूसरों से नहीं, खुद से असंतुष्ट हैं। रिश्ते संवाद से नहीं, चिल्लाहट से चलने लगे हैं। जीत का अर्...

कविता श्रृंखला: अनकहे एहसास: दिल की बात

कविता श्रृंखला:  अनकहे एहसास: दिल की बात  अनकहे एहसास: दिल की बात ~ आनंद किशोर मेहता मैं दिया हूँ मैं दिया हूँ… मुझे बस अंधेरे से शिकायत है, हवा से नहीं। वो तो बस चलती है— कभी मेरे खिलाफ, कभी मेरे साथ। मैं चुप हूँ, पर बुझा नहीं, क्योंकि मेरा काम जलना है। ताकि किसी राह में भटके हुए को रौशनी मिल सके। मुझे दिखावा नहीं आता, ना ही शोर मचाना। मैं जलता हूँ भीतर से— सच, प्रेम और सब्र के संग। हवा सोचती है, कि वो मुझे गिरा सकती है। पर उसे क्या पता— मैं हर बार राख से भी फिर से जल उठता हूँ। मैं दिया हूँ… नम्र हूँ, शांत हूँ, मगर कमजोर नहीं। मैं अंधेरे का दुश्मन हूँ, इसलिए उजाले का दोस्त बना हूँ। तू चाहे जितनी बार आज़मा ले, मैं फिर भी वही रहूँगा— धीरे-धीरे जलता, पर हर दिल को छूता। "दीया कभी अंधेरे से डरता नहीं, वो तो उसी के बीच खुद को साबित करता है।" ─ आनंद किशोर मेहता जो कुछ नहीं कहता जो चुपचाप सब सह जाता है, कुछ कहे बिना मुस्कुराता है। वो रूह बड़ी प्यारी होती है, जो सबसे पहले औरों को चाहती है। ना शिकवा करता, ना शिकायत, बस दिल में रखता है हर बात। आँखो...

THOUGHTS COLLECTION 2025

THOUGHTS:-   Thoughts — आनंद किशोर मेहता ना मुझे काना-फूसी भाती है, ना जी-हुजूरी रास आती है; मैं तो बस प्रेम का राही हूँ। झूठ के सहारे बड़ी-बड़ी बातें की जा सकती हैं, लेकिन मानवता की ऊँचाई केवल सच से ही हासिल होती है। मानवता कोई वेश नहीं, जिसे ज़रूरत के हिसाब से बदला जा सके — यह तो आत्मा की असली परछाई है। जहाँ स्वार्थ बोलते हैं, वहाँ वास्तविकता खामोश हो जाती है — क्योंकि वह दिखावे की मोहताज नहीं होती। जो अपने ही मन की भ्रमों और दुर्बलताओं पर विजय पा ले — वही सच्चा शूरवीर है। माँ-बाप वो साया हैं जो धूप में जलते हुए भी हमें ठंडक देते हैं — और हम छाँव में रहकर भी उनकी तपन को नज़रअंदाज़ कर जाते हैं। दुनिया चाहे झूठ बोले या भ्रम फैलाए — पर अंततः तुम्हारा कर्म ही तुम्हारी पहचान बनता है। कृतज्ञता वह चाबी है जो हमारे पास मौजूद चीज़ों को ही पर्याप्त बना देती है। जीवन एक यात्रा है — कुछ साथ चलते हैं, कुछ मोड़ पर विदा लेते हैं, पर जिनसे प्रेम था, वे कभी दूर नहीं जाते। असली संघर्ष सड़क पर नहीं, अंदर की चुप्पी में छिपा होता है। कुछ स्थितियाँ स्वीकारना ही शां...

सेवा की रहमत: जब 'मैं' मिट गया

सेवा की रहमत: जब 'मैं' मिट गया । कभी-कभी जीवन की राह में एक ऐसा मोड़ आता है, जहाँ कोई आवाज़ नहीं होती — पर भीतर एक गूंज उठती है। एक सोच जागती है… और उसी क्षण सब कुछ बदल जाता है। मैं उस क्षण की बात कर रहा हूँ, जब अहंकार की दीवारें खुद-ब-खुद ढहने लगती हैं, और “मैं” — जो अब तक हर सोच, हर भाव, हर कर्म का केंद्र था — धीरे-धीरे पिघलने लगता है। जब 'मैं' खो गया, तो कोई राह न रही, कोई मंज़िल न रही। पर वहीं से एक नई यात्रा शुरू हुई — रूह की यात्रा, जिसमें मौन बोलने लगा, और ख़ामोशी में सेवा का अर्थ समझ में आने लगा। सेवा तब तक बोझ लगती है, जब तक वह किसी पुण्य या फल की आशा से जुड़ी हो। पर जब ‘मैं’ मिटता है, तब सेवा एक रहमत बन जाती है — ऐसी रहमत जो आत्मा को हल्का करती है, और कर्म को इबादत में बदल देती है। मैंने जाना, सेवा तब सबसे पवित्र होती है, जब उसे करने वाला मौजूद ही न हो — केवल भाव बचे, समर्पण बचा, और रूह की ख़ामोशी बचे। अब न कोई नाम चाहता हूँ, न कोई पद, न कोई पहचान। बस एक सौगात चाहिए — कि किसी की आँख में आँसू हो, तो मेरी चुप्पी उसे सहारा दे सके। सेव...

(भाग दूसरा) दयालबाग: सेवा, विज्ञान और साधना का समन्वित जीवन

(भाग दूसरा) दयालबाग : सेवा, विज्ञान और साधना का समन्वित जीवन :-  प्रस्तावना   ~ आनंद किशोर मेहता दयालबाग केवल एक स्थान नहीं, एक जीवन-दर्शन है — एक ऐसा सजीव आदर्श, जहाँ सेवा, विज्ञान और साधना का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। यह वह भूमि है, जहाँ मनुष्य केवल सांसें नहीं लेता, बल्कि हर श्वास को सार्थकता प्रदान करता है। यहाँ जीवन यापन नहीं, बल्कि जीवन का उत्कर्ष लक्ष्य होता है। दयालबाग की आत्मा सेवा में निहित है — निःस्वार्थ, निरंतर और समर्पित सेवा, जो न किसी प्रचार की आकांक्षा रखती है, न ही किसी पुरस्कार की प्रतीक्षा करती है। यहाँ का विज्ञान भी केवल प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं, बल्कि समाजोत्थान का माध्यम है — जो शिक्षित करता है, परिष्कृत करता है और जीवन को अधिक उपयोगी बनाता है। साधना यहाँ केवल ध्यान-कक्षों की सीमा में नहीं, बल्कि हर कर्म, हर विचार और हर संबंध में समाहित है — कर्म ही भक्ति है , यही इसका मर्म है। इस खंड के लेखों में दयालबाग के उसी समग्र और संतुलित जीवन-दर्शन की झलक प्रस्तुत की गई है। यहाँ के अनुभव न केवल प्रेरणा देते हैं, बल्कि यह विश्वास भी जगाते हैं कि यदि...