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From Struggle to Self-Mastery | Inspirational & Spiritual Hindi Poetry by A K Mehta

अब समय तुम्हारा है…

जब भीतर कोई आवाज़ उठे—
“अब समय तुम्हारा है,”
तो कदमों को मत बाँधो तुम,
बस आगे बढ़ते जाना है।

राहें होंगी टेढ़ी-मेढ़ी,
धूप भी सिर पर आएगी,
पर चलते रहने वालों को ही
मंज़िल गले लगाएगी।

धीरे चलो तो भी क्या ग़म,
बस रुकना तुम्हारा काम नहीं,
थक जाओ तो ठहर जाना,
पर हार मानना नाम नहीं।

कभी गिरोगे, कभी सँभलोगे,
यही सफर की कहानी है,
जो हर हाल में आगे बढ़े,
वही असली वीर निशानी है।

तो जब भी दिल ये कहे तुमसे—
“अब वक़्त बदलने वाला है,”
तो डर को पीछे छोड़ के बस
अपने रास्ते चलना है।

— Anand Kishor Mehta



अंतर्यामी का स्पर्श

जब मन की तरंगें शांत हो जाती हैं,
और विचार भी थककर ठहर जाते हैं,
तब एक सूक्ष्म सी उपस्थिति
अंतर में धीरे-धीरे प्रकट होती है।

वो शब्दों से परे है,
पर हर शब्द उसी से जन्म लेता है।
वो रूप से परे है,
पर हर रूप में वही बसता है।

मेरी हर अनकही प्रार्थना
उस तक बिना मार्ग के पहुँच जाती है,
क्योंकि वो कहीं बाहर नहीं—
मेरे ही अस्तित्व में विराजमान है।

जब अहंकार मिटने लगता है,
और “मैं” का बंधन ढलने लगता है,
तब उसी के प्रकाश में
सत्य का द्वार खुलने लगता है।

वो न दूरी में है, न पास में,
न खोज में है, न प्रयास में—
वो तो बस है…
हर श्वास में, हर निवास में।

उसकी कृपा कोई घटना नहीं,
एक निरंतर बहने वाली धारा है,
जो हर जीव, हर क्षण, हर दिशा में
अदृश्य होकर भी सहारा है।

जब साधक भीतर उतरता है,
और स्वयं को समर्पित कर देता है,
तब वही परम सत्य बनकर
अपने अस्तित्व का बोध कराता है।

मैं नहीं… वही है—
यही अंत है, यही आरंभ है।

A K Mehta








स्वयं पर विजय: असली वीर की पहचान

खुद से जो हर दिन लड़ता है,
वही असली वीर कहलाता है।

भीतर के डर को हराकर जो,
सपनों तक कदम बढ़ाता है।

आलस्य की जंजीरें तोड़,
अनुशासन को अपनाता है।

आत्म-संदेह के अंधेरों में,
विश्वास का दीप जलाता है।

गिरकर फिर जो उठ जाता है,
वही जीवन को सजाता है।

दुनिया से बड़ी जीत वही,
जो खुद पर विजय पाता है।

— A K Mehta

छूना है तो...
~ आनंद किशोर मेहता

छूना है तो पहले,
खुद को छू कर आओ,
मन के दर्पण पर जमी
स्वार्थ की धूल हटाओ।

मीठे शब्दों के फूलों से
रूह नहीं महकती,
झूठी प्रशंसा की राहों से
सच्चाई नहीं बहकती।

मैं कोई द्वार नहीं
जो चापलूसी से खुल जाऊँ,
मैं वो एहसास हूँ
जो केवल सत्य से मिल पाऊँ।

अपने भीतर उतरकर देखो,
क्या मन निर्मल है तुम्हारा?
क्या भावों में निःस्वार्थता है,
क्या प्रेम है सचमुच प्यारा?

यदि हाँ—
तो फिर शब्दों की ज़रूरत क्या,
मौन ही परिचय देगा,
तुम्हारी सच्ची दृष्टि ही
दिल तक मार्ग लेगा।

मैं वहाँ नहीं
जहाँ दिखावे का शोर है,
मैं वहाँ हूँ
जहाँ आत्मा का मौन गहन और भोर है।

तो आना—
पर पहले स्वयं को पहचान कर आना,
यदि मुझे सच में छूना है,
तो सत्य का स्पर्श साथ लाना।

— A K Mehta

बस ऐसे ही…

किसे समझाऊँ अब,
और कौन समझेगा भी…
जितना खुद को सही बताने की कोशिश की,
लोग उतना ही गलत समझते गए।

अब तो बस ख़ामोशी अच्छी लगती है,
कम से कम वहाँ कोई सवाल नहीं करता।

ज़िंदगी भी धीरे-धीरे सब सिखा देती है…
कौन अपना है,
और कौन सिर्फ़ बातों में साथ होता है।

कुछ लोग आज भी दिल में हैं,
चाहे अब साथ नहीं हैं…
और शायद कुछ यादें
कभी खत्म नहीं होतीं।

अब किस्मत से लड़ना छोड़ दिया है,
जो हो रहा है उसे होने देते हैं…
क्योंकि आख़िर
हमने यहाँ कौन सा हमेशा रह जाना है।

— A K Mehta







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