जीवन लगातार चल रहा है—कभी विचारों का शोर, कभी भावनाओं का तूफान, और कभी परिस्थितियों का दबाव। लेकिन इन सबके बीच एक ऐसी स्थिति भी है जहाँ मन शांत होकर केवल देखता है, बिना जुड़ाव और बिना प्रतिक्रिया के। इसी अवस्था को साक्षी भाव कहा जाता है।
साक्षी वह है जो भीतर बैठकर हर अनुभव को केवल देखता है। वह न किसी विचार से भागता है और न ही किसी भावना में खोता है। वह बस जागरूक रहता है—स्थिर, शांत और मौन।
जब हम अपने विचारों और भावनाओं को ही अपना “स्वरूप” मान लेते हैं, तब जीवन उलझ जाता है। लेकिन जब हम उन्हें केवल देखने लगते हैं, तब एक दूरी बनती है—और उसी दूरी में शांति जन्म लेती है।
साक्षी भाव हमें सिखाता है कि हम केवल प्रतिक्रिया करने वाले नहीं हैं, बल्कि देखने वाले भी हैं। सुख आता है तो जाता है, दुख आता है तो चला जाता है—लेकिन जो सबको देख रहा है, वह स्थिर रहता है।
धीरे-धीरे जब यह समझ गहरी होने लगती है, तब जीवन हल्का हो जाता है। चीजें बदलती नहीं, लेकिन उन्हें देखने का तरीका बदल जाता है।
साक्षी बनना जीवन से दूर जाना नहीं, बल्कि जीवन को गहराई से समझना है।
साक्षी – जीवन का मौन दर्शक

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