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गाँव में घटता विश्वास और बढ़ती दूरियाँ | A K Mehta









गाँव अब पहले जैसे सुरक्षित और अपने क्यों नहीं रहे?

यह प्रश्न केवल किसी एक गाँव का नहीं,
बल्कि बदलते समाज का आईना है।

जहाँ कभी विश्वास और अपनापन था,
वहाँ आज अविश्वास, गुटबाज़ी और दूरियाँ बढ़ती दिखाई दे रही हैं।
कुछ नकारात्मक और आपराधिक प्रवृत्तियाँ पूरे वातावरण को प्रभावित कर रही हैं,
और सबसे चिंताजनक बात यह है कि अच्छे लोग धीरे-धीेरे मौन होते जा रहे हैं।

किसी भी समाज की वास्तविक ताकत
उसकी इंसानियत, न्याय, संस्कार और आपसी सम्मान में होती है।
जब यही मूल्य कमजोर पड़ने लगते हैं,
तो विकास भी अधूरा और खोखला महसूस होने लगता है।

हमें केवल बेहतर गाँव बनाने की नहीं,
बल्कि बेहतर सोच, बेहतर चरित्र और बेहतर समाज बनाने की आवश्यकता है।

“समाज तब नहीं हारता जब बुरे लोग बढ़ते हैं,
समाज तब हारता है जब अच्छे लोग मौन हो जाते हैं।”

और याद रखिए—

“किसी पर उंगली उठाने से पहले
स्वयं के विचार, व्यवहार और चरित्र को अवश्य देखिए।
क्योंकि दूसरों की गलतियाँ गिनाने से पहले
इंसान की अपनी पहचान भी सामने आ जाती है।”

A K Mehta


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