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गाँव की सुबह, मन की मुस्कान

 गाँव की सुबह, मन की मुस्कान 


आज सुबह गाँव वैसा ही था,
जैसा हर दिन होता है।
फिर भी पता नहीं क्यों
मन कुछ ज़्यादा ही शांत था।

आसमान हल्का-सा सुनहरा हो रहा था।
सूरज धीरे-धीरे ऊपर आ रहा था,
जैसे उसे भी कोई जल्दी न हो।

पगडंडी पर चलते हुए
मैंने महसूस किया —
यह रास्ता कहीं बाहर नहीं,
अंदर तक जाता है।

ओस से भीगी घास पर
जब कदम पड़े,
तो लगा जैसे धरती ने
चुपचाप स्वागत किया हो।

दूर से आती बच्चों की हँसी
हवा में घुल रही थी।
उनकी मुस्कान में
कोई चिंता नहीं थी,
कोई तुलना नहीं थी।

लोग अपने काम में लगे थे,
बिना शोर, बिना दिखावे।
हर चेहरा साधारण था,
पर संतुष्ट।

तभी समझ आया —
खुशी बड़ी घटनाओं में नहीं,
इन छोटे पलों में छिपी रहती है।

गाँव कुछ कहता नहीं,
पर बहुत कुछ जगा देता है।
यह सिखाता नहीं,
पर सोच बदल देता है।

जब लौटकर घर आया,
तो सब पहले जैसा ही था —
बस मन अलग था।

हल्का…
स्पष्ट…
और मुस्कुराता हुआ।

शायद यही गाँव की सुबह का असर है —
जो बिना बोले
भीतर एक नई रोशनी जगा देती है।

— Anand Kishor Mehta 🌿

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