अगर सच में “मैं ही सब कुछ करता हूँ”, तो एक बार अपनी साँस रोककर दिखाओ… फिर समझ आएगा कि कर्ता कौन है।
हम बहुत सहजता से कहते हैं — “मैंने यह किया”, “मेरी मेहनत थी”, “मेरे कारण यह हुआ।”
लेकिन क्या सच में हर चीज़ का केंद्र “मैं” ही है?
सच यह है कि जीवन का बहुत बड़ा हिस्सा हमारे नियंत्रण में नहीं है। साँस का चलना, विचारों का आना, परिस्थितियों का बदलना — इनमें से कुछ भी पूरी तरह हमारे हाथ में नहीं है। फिर भी एक आदत है जो हर अनुभव का श्रेय “मैं” को दे देती है।
यहीं से शुरू होता है कर्ता भाव का भ्रम।
यह भ्रम धीरे-धीरे अहंकार बन जाता है। सफलता में “मैं” बढ़ जाता है और असफलता में वही “मैं” टूट जाता है — क्योंकि आधार वास्तविकता नहीं, एक मानसिक कल्पना होती है।
अगर जीवन को थोड़ा दूर से देखा जाए, तो समझ आता है कि हम पूर्ण कर्ता नहीं, बल्कि केवल एक माध्यम हैं।
विचार आते हैं, कर्म होते हैं, परिस्थितियाँ बदलती हैं — और हम बस उस प्रवाह में बहते रहते हैं।
जैसे हवा के बिना पत्ते नहीं हिलते, वैसे ही जीवन की घटनाएँ किसी गहरे प्रवाह का हिस्सा हैं, जिसमें हम नियंत्रक नहीं, सहभागी हैं।
और जिस दिन यह समझ भीतर उतरती है कि “मैं सब कुछ नहीं कर रहा”, उसी दिन मन हल्का हो जाता है।
कर्म बोझ नहीं रहते, अपेक्षाएँ कम हो जाती हैं और जीवन सरल हो जाता है।
शायद सबसे गहरी समझ यही है — हम कर्ता नहीं, साक्षी हैं।
और फिर प्रश्न रह जाता है…
सब कुछ करने वाला “मैं” है… या सिर्फ एक भ्रम?
A K Mehta

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