मैं lesson plan के साथ नहीं पढ़ाता… मैं बच्चों के साथ पढ़ता हूँ।
क्योंकि असली कक्षा paper पर नहीं, बच्चों के सवालों के बीच बनती है।
✍️ मेरे लिए पढ़ाना कोई पहले से तय स्क्रिप्ट नहीं है, जिसे हर दिन उसी तरह निभाया जाए।
असली काम उस पल शुरू होता है जब मैं बच्चों के सामने खड़ा होता हूँ।
हर कक्षा अलग होती है। हर बच्चा अलग सोच लेकर आता है।
कभी एक साधारण सा सवाल पूरे विषय की दिशा बदल देता है,
और कभी एक चुप बच्चा भी सबसे गहरी सीख दे जाता है।
कक्षा में सबसे बड़ा बदलाव syllabus नहीं, बल्कि बच्चों की curiosity लाती है।
कभी-कभी सबसे अच्छा lesson वही होता है जो हमने पढ़ाने की योजना ही नहीं बनाई होती।
मैंने धीरे-धीरे समझा है—
अगर शिक्षक सिर्फ लिखे हुए lesson plan से बंध जाए,
तो वह कक्षा की असली आवाज़ सुन ही नहीं पाता।
हर दिन का lesson plan एक दिशा दिखाता है,
लेकिन कक्षा खुद रास्ता बनाती है।
मेरे लिए शिक्षा एक जीवित अनुभव है—
जो हर मिनट बदलता है, हर दिन नया रूप लेता है।
Plan एक सहारा है, लेकिन दिशा नहीं।
असली पढ़ाई वहीं होती है जहाँ शिक्षक और विद्यार्थी
एक साथ सोचते हैं, साथ सीखते हैं, और साथ बदलते हैं।
और शायद इसी वजह से—
जो शिक्षक कक्षा को सुन लेता है,
उसे plan की पकड़ धीरे-धीरे हल्की लगने लगती है।
मैं उस शिक्षा में विश्वास करता हूँ
जो कागज़ पर नहीं, कक्षा के भीतर जन्म लेती है।
— A. K. Mehta




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