दिमाग खाली नहीं होता… बस बहुत कुछ सोचकर थक जाता है।
कभी-कभी लगता है जैसे मन पूरी तरह खाली हो गया है…
न कोई विचार, न कोई दिशा, न कुछ करने की इच्छा।
लेकिन धीरे-धीरे समझ आता है—
ये खालीपन असल में खाली नहीं होता।
ये बस एक भरा हुआ मन होता है…
जो बहुत कुछ सुन चुका होता है, सोच चुका होता है, और अब थोड़ा शांत होना चाहता है।
मैंने पहले इसे कमजोरी समझा…
लगता था कि मुझे लगातार कुछ न कुछ बनाते रहना चाहिए।
लेकिन अब समझ बदल गई है—
हर समय दौड़ना जरूरी नहीं है।
कभी रुकना भी जरूरी है,
ताकि अंदर की आवाज फिर से साफ सुनाई दे सके।
अब मैं खुद पर दबाव नहीं डालता।
अगर कुछ नहीं आ रहा, तो मैं उसे force नहीं करता।
बस शांत हो जाता हूँ…
observe करता हूँ…
और खुद को समय देता हूँ।
क्योंकि सच यही है—
विचार जोर लगाने से नहीं आते…
वे तब आते हैं जब हम खुद को थोड़ा हल्का छोड़ देते हैं।
और शायद ये भी एक जरूरी पड़ाव है—
जहाँ मैं कुछ खो नहीं रहा,
बस अंदर ही अंदर फिर से बन रहा हूँ।


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